
संजय अग्रवाल
भारत की प्राचीनतम और सबसे प्रभावी शिक्षा प्रणाली गुरुकुल रही है। हजारों वर्षों से यह प्रणाली न केवल ज्ञान का प्रसार करती थी, बल्कि चरित्र निर्माण, नैतिकता, अनुशासन, आध्यात्मिकता और जीवन कौशल का समन्वय करती थी। वेद, उपनिषद, पुराण, योग, आयुर्वेद, ज्योतिष, युद्धकला, अर्थशास्त्र और अन्य विषयों का अध्ययन गुरु-शिष्य परंपरा में होता था, जहां विद्यार्थी गुरु के आश्रम में रहकर सेवा, अध्ययन और तपस्या करते थे। यह शिक्षा निःशुल्क होती थी और समाज द्वारा समर्थित होती थी। गुरुकुल ने न केवल महान ऋषियों, राजाओं और योद्धाओं को जन्म दिया, बल्कि भारतीय संस्कृति की मजबूत नींव रखी।
नीचे कुछ प्रमुख ऐतिहासिक गुरुकुलों के विस्तृत उदाहरण दिए गए हैं, जो वेद-उपनिषद और ऐतिहासिक साक्ष्यों से प्रमाणित हैं:
1. तक्षशिला गुरुकुल / विश्वविद्यालय
स्थान: वर्तमान पाकिस्तान के पंजाब क्षेत्र में (टैक्सिला)।
समय: कम से कम 6ठी-5वीं शताब्दी ईसा पूर्व से 5वीं शताब्दी ईस्वी तक (लगभग 2700 वर्ष पुराना)।
विशेषताएं: दुनिया का सबसे प्राचीन ज्ञात उच्च शिक्षा केंद्र माना जाता है। यहां 10,500 से अधिक छात्र पढ़ते थे, जो विश्व भर से आते थे। 64 से अधिक विषय पढ़ाए जाते थे, जैसे वेद, व्याकरण, दर्शनशास्त्र, आयुर्वेद, शल्य चिकित्सा, राजनीति शास्त्र, अर्थशास्त्र, युद्धकला (धनुर्विद्या), खगोलशास्त्र, संगीत, नृत्य, कृषि, वाणिज्य आदि।
प्रसिद्ध छात्र/शिक्षक: चाणक्य (अर्थशास्त्र के रचयिता), पाणिनि (व्याकरण के महान आचार्य, अष्टाध्यायी के लेखक), जीवक (प्रसिद्ध चिकित्सक), और कई अन्य।
महत्व: व्यक्तिगत आधार पर शिक्षा, कोई बड़ा लेक्चर हॉल नहीं, बल्कि मठों में गुरु-शिष्य परंपरा। यह गुरुकुल का विकसित रूप था।
2बिहार (मगध राज्य)।
समय: 5वीं शताब्दी ईस्वी से 12वीं शताब्दी तक (गुप्त काल से पाल वंश तक)।
विशेषताएं: गुरुकुल का सबसे विकसित रूप, जहां 10,000 से अधिक छात्र और 2000 शिक्षक थे। 9 मिलियन पांडुलिपियों वाली विशाल लाइब्रेरी। वेद, बौद्ध दर्शन, तर्कशास्त्र, व्याकरण, चिकित्सा, गणित आदि पढ़ाए जाते थे।
प्रसिद्ध आगंतुक/छात्र: ह्वेनसांग (चीन से), इत्सिंग, नागार्जुन आदि।
महत्व: अंतरराष्ट्रीय स्तर का केंद्र, जहां विदेशी छात्र भी पढ़ने आते थे।
3धार भोजशाला मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित एक ऐतिहासिक और अत्यंत महत्वपूर्ण स्थल है, जिसे प्राचीन काल में गुरुकुल (या संस्कृत महाविद्यालय) के रूप में जाना जाता था। यह राजा भोज द्वारा स्थापित एक प्रमुख शिक्षा केंद्र था, जो मां सरस्वती (वाग्देवी) के मंदिर के साथ जुड़ा हुआ था।
निर्माण और स्थापना
संस्थापक: परमार वंश के महान राजा भोज (शासनकाल: लगभग 1000-1055 ईस्वी)।
स्थापना वर्ष: 1034 ईस्वी में राजा भोज ने धार (तत्कालीन मालवा की राजधानी) में सरस्वती सदन की स्थापना की, जिसे बाद में भोजशाला कहा जाने लगा।
उद्देश्य: यह केवल एक मंदिर नहीं था, बल्कि एक बड़ा आवासीय संस्कृत विश्वविद्यालय था, जो नालंदा और तक्षशिला की तरह शिक्षा का प्रमुख केंद्र था। यहां विद्या, संस्कृति, आध्यात्मिकता और ज्ञान का समन्वय था।
राजा भोज को 72 कलाओं और 36 युद्ध विधाओं का ज्ञाता माना जाता था। वे संस्कृत के महान विद्वान, कवि, योग विशेषज्ञ और वास्तुशास्त्र के रचयिता थे। उन्होंने भोजशाला को शिक्षा का ऐसा केंद्र बनाया जहां छात्र दूर-दूर से आते थे।
दुर्भाग्य से, 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश शासन के दौरान लॉर्ड मैकाले ने 1835 में अपनी प्रसिद्ध मिनट में भारतीय शिक्षा प्रणाली को नष्ट करने का षड्यंत्र रचा। उन्होंने कहा था कि हमें ऐसे भारतीय चाहिए जो “रंग में भारतीय लेकिन स्वाद में अंग्रेज” हों। मैकाले की नीति के तहत गुरुकुलों को व्यवस्थित रूप से कमजोर किया गया, उन्हें बंद करवाया गया या उनकी जगह अंग्रेजी माध्यम की मैकालेरी शिक्षा को थोपा गया। इसका उद्देश्य था भारतीयों की सांस्कृतिक जड़ों को काटना, उन्हें अपनी विरासत से विमुख करना और गुलामी की मानसिकता में जकड़ना। परिणामस्वरूप आज हमारी शिक्षा प्रणाली में नैतिक मूल्य, स्वदेशी ज्ञान और चरित्र निर्माण की कमी है। युवा पीढ़ी अंग्रेजी माध्यम की किताबी शिक्षा में फंसी है, लेकिन जीवन मूल्यों से दूर हो रही है।
आज समय आ गया है कि हम इस ऐतिहासिक अन्याय को सुधारें। गुरुकुल पद्धति को पुनः स्थापित किया जाना चाहिए, और यह कार्य जमीनी स्तर पर होना चाहिए। मध्य प्रदेश जैसे विशाल और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध राज्य में तहसील स्तर पर गुरुकुलों की स्थापना अनिवार्य होनी चाहिए। प्रत्येक तहसील में कम से कम एक सरकारी या सहायता प्राप्त गुरुकुल होना चाहिए, जहां:
वैदिक शिक्षा, संस्कृत, शास्त्र, वेदांत, योग, आयुर्वेद और आधुनिक विषयों (विज्ञान, गणित, कंप्यूटर) का समन्वित अध्ययन हो।
शिक्षा निःशुल्क या न्यूनतम शुल्क पर हो, ताकि गरीब परिवार के बच्चे भी पहुंच सकें।
छात्र गुरुकुल में रहें, गुरु की सेवा करें और चरित्रवान, राष्ट्रभक्त नागरिक बनें।
स्थानीय संस्कृति, पर्यावरण और स्वदेशी ज्ञान पर जोर हो।
मध्य प्रदेश में पहले से ही कुछ गुरुकुल कार्यरत हैं, जैसे होशंगाबाद, रतलाम आदि में, लेकिन इन्हें राज्यव्यापी बनाना होगा। सरकार को भूमि, अनुदान और नीतिगत समर्थन प्रदान करना चाहिए। वर्ल्ड हिंदू फेडरेशन मध्य प्रदेश इस दिशा में सक्रिय प्रयास कर रहा है। हम समाज, संतों, शिक्षाविदों और सरकार से आह्वान करते हैं कि गुरुकुल क्रांति शुरू की जाए।
यदि हम गुरुकुलों को पुनर्जीवित करेंगे, तो भारत पुनः विश्व गुरु बनेगा। युवा न केवल नौकरी पाएंगे, बल्कि संस्कारवान, आत्मविश्वासी और सांस्कृतिक रूप से मजबूत होंगे। आइए, मैकाले की गुलामी की जंजीर तोड़ें और अपनी प्राचीन गुरुकुल परंपरा को पुनः स्थापित करें।
( लेखक वर्ल्ड हिंदू फेडरेशन मध्य प्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष हैं । लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के निजी है, इनसे माधव एक्सप्रेस प्रबंधन एवं संपादक की सहमति अनिवार्य नहीं है। )
