फ़िल्म समीक्षक
डॉ.महेन्द्र यादव

“मेरा नाम जोकर” उस दौर की फ़िल्म है, जब सिनेमा दर्शक से नहीं, अपने रचनाकार से बात करता था।
1970 में जब यह फ़िल्म रिलीज़ हुई, तब इसे एक लंबी, बोझिल और आत्ममुग्ध कृति कहकर नकार दिया गया। लेकिन आधी सदी बाद यह सवाल उठता है—क्या यह फ़िल्म असफल थी, या अपने समय से इतनी आगे कि उसका समय ही गलत था? राज कपूर का जोकर हँसाता है, गिरता है, फिर उठता है—और हर बार दर्शक से नहीं, अपने जीवन से संवाद करता है। शायद यही वजह है कि यह फ़िल्म आज पहले से ज़्यादा सच्ची लगती है।
अपने समय में नकार दी गई यह फ़िल्म आज सिनेमा और कलाकार के अकेलेपन की सबसे ईमानदार कथा बनकर सामने आती है।
मेरा नाम जोकर: एक असफलता, जो क्लासिक बन गई
राज कपूर की “मेरा नाम जोकर” (1970) भारतीय सिनेमा की उन दुर्लभ फ़िल्मों में है, जिन्हें देखने के लिए नहीं, समझने के लिए समय चाहिए। यह फ़िल्म अपने दौर में अस्वीकार की गई, लेकिन आज जब सिनेमा आत्मस्वीकृति और आत्मकथा की ओर लौट रहा है, तब यह कृति पहले से कहीं ज़्यादा प्रासंगिक लगती है।
यह फ़िल्म एक जोकर की कहानी है—जो दूसरों को हँसाने के लिए बना है, लेकिन खुद की ज़िंदगी में लगातार हारता है। राज कपूर का जोकर कोई काल्पनिक पात्र नहीं, बल्कि स्वयं राज कपूर का विस्तार है—एक कलाकार, जो मंच पर तालियाँ पाता है और पर्दे के पीछे अकेला रह जाता है।
कथा: सर्कस के भीतर की त्रासदी
फ़िल्म तीन प्रेम-कथाओं के माध्यम से आगे बढ़ती है, लेकिन यह प्रेम से ज़्यादा विछोह और अस्वीकार की कहानी है। हर रिश्ता जोकर को कुछ सिखाता है—कि कलाकार का प्रेम भी अंततः दर्शक और समाज की शर्तों पर ही स्वीकार होता है। यहाँ प्रेम मंज़िल नहीं, अनुभव है; और अनुभव अंततः पीड़ा में बदल जाता है।
निर्देशन और दृष्टि
राज कपूर ने इस फ़िल्म में निर्देशक से ज़्यादा स्वीकारोक्ति करने वाले कलाकार की भूमिका निभाई है। यही इसकी ताक़त भी है और कमज़ोरी भी। फ़िल्म लंबी है, आत्ममुग्ध भी लगती है, लेकिन यह आत्ममुग्धता दरअसल एक कलाकार की ईमानदारी है—वह खुद को छिपाना नहीं चाहता।
संगीत: जो आज भी बोलता है
शंकर–जयकिशन का संगीत फ़िल्म की आत्मा है।
“जीना यहाँ, मरना यहाँ” सिर्फ़ गीत नहीं, फ़िल्म का दर्शन है।
“ए भाई ज़रा देख के चलो” में छिपा व्यंग्य आज भी चुभता है।
यह संगीत कहानी को आगे नहीं बढ़ाता, उसे गहराता है।
अभिनय: जोकर का सच
राज कपूर का अभिनय संयमित नहीं, बल्कि आत्मीय है। वह जोकर बनकर अभिनय नहीं करते—वह जोकर हो जाते हैं। सहायक कलाकारों में धर्मेंद्र और मनोज कुमार की उपस्थिति प्रतीकात्मक है, लेकिन फ़िल्म अंततः एक ही चेहरे पर ठहरती है—जोकर के।
असफलता क्यों हुई?
1970 का दर्शक इस फ़िल्म के लिए तैयार नहीं था। उसे मनोरंजन चाहिए था, आत्मालोचना नहीं। उसे नायक चाहिए था, टूटता हुआ कलाकार नहीं।
यही कारण है कि यह फ़िल्म अपने समय में हार गई—और इतिहास में जीत गई।
आज क्यों ज़रूरी है “मेरा नाम जोकर”?
आज, जब सिनेमा बार-बार आत्मकथात्मक हो रहा है, जब कलाकार अपनी असुरक्षाओं पर बात कर रहा है, तब “मेरा नाम जोकर” एक पूर्वज की तरह सामने खड़ी है—यह बताने के लिए कि यह साहस नया नहीं है।
निष्कर्ष
“मेरा नाम जोकर” एक परिपूर्ण फ़िल्म नहीं है, लेकिन यह एक ईमानदार फ़िल्म है।
और कभी-कभी सिनेमा में ईमानदारी, परिपूर्णता से कहीं ज़्यादा टिकाऊ होती है।
यह फ़िल्म नहीं पूछती कि आपको पसंद आई या नहीं,
यह बस इतना पूछती है:
क्या आप एक कलाकार के अकेलेपन को देखने के लिए तैयार हैं?
यह फ़िल्म यूट्यूब और ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म ZEE5 पर उपलब्ध है। यदि आप फ़िल्मों के शौकीन हैं, तो यह फ़िल्म एक बार अवश्य देखनी चाहिए।
