
फ़िल्म समीक्षक : डॉ. महेन्द्र यादव
कालजयी फ़िल्म : ‘प्यासा’ (1957)
संवेदनशील कवि की पीड़ा और समाज का निर्मम चेहरा
हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ फ़िल्में ऐसी होती हैं जो केवल देखी नहीं जातीं, बल्कि मन के भीतर उतरकर स्थायी ठिकाना बना लेती हैं। प्यासा ऐसी ही एक अमर कृति है, जिसे गुरु दत्त ने सिर्फ़ बनाया नहीं—जिया है। यह फिल्म प्रेम, पीड़ा, अस्वीकार और समाज की निष्ठुर सच्चाइयों को इस तरह प्रस्तुत करती है कि दर्शक अंत तक अपने ही समय से सवाल करने लगता है।
कहानी : एक कवि जो अपने समय से आगे था
विजय… एक ऐसा कवि, जिसकी संवेदनाएँ उसके समय से बड़ी हैं। पर वही समाज, जिसे उसकी कविता आईना दिखाती है, उसे “नाकाम” घोषित कर देता है।
बड़े भाई उसे घर से निकाल देते है। उसकी कविताओं की डायरी रद्दी में बेच दी जाती है—जैसे सपनों का मूल्य किलो के भाव तय हो रहा हो। दोस्त, जो कभी साथ था, पैसे और प्रतिष्ठा के लालच में पहचानने से इनकार कर देता है।
आज लोग कहते हैं—पैसा ही सबकुछ है। रिश्ते-नाते, संवेदनाएँ, आदर्श—सब चकाचौंध के आगे फीके पड़ जाते हैं। गुरु दत्त ने यह सच्चाई 1957 में ही देख ली थी। यही कारण है कि फिल्म आज भी चुभती है।
अभिनय : किरदार नहीं, धड़कती आत्माएँ
वहीदा रहमान की गुलाबो—एक तवायफ़ होकर भी सबसे अधिक मानवीय चरित्र है। उनका मौन प्रेम विजय के टूटे मन का सहारा बनता है।
माला सिन्हा की मीना महत्वाकांक्षा और सामाजिक दबावों में उलझी उस स्त्री का चेहरा है, जो प्रेम से अधिक सुरक्षित भविष्य चुन लेती है।
और विजय… गुरु दत्त की आँखों में जो दर्द है, वह अभिनय नहीं—वह आत्मस्वीकृति है।
गीत–संगीत : कर्णप्रिय धुनों में छिपा सामाजिक विद्रोह
इस फिल्म का संगीत इसकी आत्मा है। साहिर लुधियानवी के शब्द सीधे दिल में उतरते हैं, एस. डी. बर्मन की धुनें उन्हें कालजयी बनाती हैं, और मोहम्मद रफ़ी व गीता दत्त की आवाज़ें उन्हें अमर कर देती हैं।
“ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है” तो मानो पूरी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न है।
लेकिन इसके अलावा भी कई गीत फिल्म की भावनात्मक परतों को गहराई देते हैं—
“जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला” टूटे मन की करुण पुकार है।
“आज सजन मोहे अंग लगा लो” विरह की व्यथा को मधुर स्वर देता है।
“हम आपकी आँखों में इस दिल को बसा दें तो” प्रेम की कोमल अभिव्यक्ति है।
“सर जो तेरा चकराए” हल्के-फुल्के अंदाज़ में फिल्म की गंभीरता को संतुलित करता है।
इन सभी गीतों का संगीत इतना कर्णप्रिय है कि सुनते हुए लगता है जैसे हर धुन कहानी को आगे बढ़ा रही हो। यहाँ गीत मनोरंजन नहीं, कथानक का विस्तार हैं—हर शब्द एक भाव, हर धुन एक विचार।
निर्देशन और सस्पेंस : स्वीकार या अस्वीकार?
छायाकार वी. के. मूर्ति के फ्रेम रोशनी और साए के माध्यम से भावनाओं को रचते हैं।
फिल्म का चरम दृश्य—जब वही समाज, जिसने विजय को ठुकराया था, उसे सिर पर बैठाने लगता है—दर्शक को असहज कर देता है।
पर असली सस्पेंस यह है—क्या विजय उस सम्मान को स्वीकार करेगा?
क्या वह उस भीड़ का हिस्सा बनेगा जिसने उसे जिंदा रहते नकार दिया था?
इस प्रश्न का उत्तर फिल्म के अंतिम दृश्य में छिपा है… और वही दृश्य आपको देर तक सोचने पर मजबूर कर देगा।
आज भी क्यों प्रासंगिक है ‘प्यासा’
क्योंकि आज भी संघर्षरत कलाकारों की रचनाएँ रद्दी में बिकती हैं।
आज भी रिश्ते पैसे के तराज़ू पर तौले जाते हैं।
आज भी पहचान “सफलता” से तय होती है, संवेदना से नहीं।
गुरु दत्त का यह सिनेमाई आईना आज और भी स्पष्ट दिखता है।
यह फ़िल्म YOUTUBE और Prime Video पर उपलब्ध है।
यदि आप सिनेमा को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मानुभूति मानते हैं—
यदि आप कर्णप्रिय संगीत और गहरी संवेदना का संगम देखना चाहते हैं—
तो प्यासा अवश्य देखिए।
यह फिल्म आपको सिर्फ़ भावुक नहीं करेगी…
यह आपको आईने के सामने खड़ा कर देगी।
