बांग्लादेश नेशनल पार्टी जिसके नेता तारिक रहमान अब प्रधानमंत्री बनने की स्थिति में हैं, ने ऐतिहासिक बहुमत हासिल किया है। आधिकारिक चुनाव आयोग के अनुसार, BNP और उसके सहयोगियों ने 299 में से कम से कम 212 सीटें जीती हैं जो संसद में दो-तिहाई से अधिक बहुमत है। मुख्य विपक्षी जमाते इस्लामी के नेतृत्व वाले 11-दलीय गठबंधन को 77 सीटें मिली हैं, जबकि अन्य छोटे दल और स्वतंत्र उम्मीदवारों को बाकी सीटें प्राप्त हुईं। यह चुनाव 2024 के छात्र-नेतृत्व वाले विद्रोह के बाद पहला बड़ा चुनाव था, जिसमें अवामी लीग को प्रतिबंधित कर दिया गया था।
यह परिणाम भारत-बांग्लादेश संबंधों के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है, क्योंकि पिछले डेढ़ साल में संबंध तनावपूर्ण रहे हैं—शेख हसीना के निर्वासन, हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमलों की घटनाओं (2024-2025 में 2,000+ रिपोर्टेड मामले), सीमा विवाद और जल-बंटवारे जैसे मुद्दों के कारण। भारत की प्राथमिक चिंता बांग्लादेश में रहने वाले हिंदू अल्पसंख्यकों (करीब 8-10% आबादी) की सुरक्षा है, जो ऐतिहासिक रूप से राजनीतिक अस्थिरता में सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।
नई BNP सरकार के साथ भारत को कूटनीति में संतुलित, सकारात्मक लेकिन दृढ़ दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, ताकि अल्पसंख्यक हितों की रक्षा हो सके।
1. तत्काल उच्च-स्तरीय जुड़ाव और विश्वास बहाली
भारत को तारिक रहमान की सरकार के गठन के तुरंत बाद उच्च-स्तरीय प्रतिनिधिमंडल भेजना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले ही चुनाव परिणाम आने के कुछ घंटों बाद तारिक रहमान से बात की है, जो एक सकारात्मक शुरुआत है।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर या अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की ढाका यात्रा करनी चाहिए, जहां हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को प्रमुख एजेंडा बनाया जाए। तारिक रहमान ने पहले ही “सभी अल्पसंख्यकों की सुरक्षा” और “समानता पर आधारित संबंध” का वादा किया है।
बदलाव: पिछले अवामी लीग-केंद्रित दृष्टिकोण से हटकर, सभी प्रमुख दलों (BNP, Jamaat, NCP) से संवाद बढ़ाएं, ताकि संबंध किसी एक पार्टी पर निर्भर न रहें।
2. अल्पसंख्यक सुरक्षा पर संयुक्त तंत्र स्थापित करना
द्विपक्षीय समझौते में एक संयुक्त निगरानी समिति बनाई जाए, जिसमें दोनों देशों के प्रतिनिधि, मानवाधिकार संगठन और अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्य शामिल हों। यह हमलों की जांच, रिपोर्टिंग और रोकथाम पर काम करे।
भारत को गोपनीय रूप से हमलों की जानकारी साझा करने की व्यवस्था मांगनी चाहिए, और बदले में सीमा सुरक्षा पर सहयोग बढ़ाना चाहिए।
BNP के दो हिंदू सांसदों (जिन्होंने मुस्लिम बहुल क्षेत्रों से जीत हासिल की) की सफलता को सकारात्मक संकेत मानकर, अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व बढ़ाने के लिए दबाव डालें।
3. सीमा प्रबंधन और सुरक्षा सहयोग को मजबूत करना
4,096 किमी लंबी सीमा पर घातक घटनाओं और अवैध आव्रजन को कम करने के लिए BSF और BGB के बीच संयुक्त गश्त और सूचना साझाकरण बढ़ाएं।
भारत को “बाड़ लगाने” के मुद्दे पर लचीला रुख अपनाना चाहिए, लेकिन सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए। BNP के “बांग्लादेश पहले” नारे के बावजूद, पारस्परिक सम्मान पर आधारित समझौता संभव है।
इससे हिंदू समुदाय के पलायन को रोका जा सकता है, क्योंकि सीमा तनाव अक्सर स्थानीय हिंसा को बढ़ावा देता है।
4. आर्थिक और विकास सहयोग से प्रभाव बढ़ाना
भारत बांग्लादेश का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है (व्यापार $12-15 बिलियन के आसपास)। निवेश बढ़ाकर (ऊर्जा, बुनियादी ढांचा, गारमेंट सेक्टर) स्थिरता सुनिश्चित करें।
सहायता को अल्पसंख्यक-केंद्रित कार्यक्रमों (शिक्षा, स्वास्थ्य, संपत्ति सुरक्षा) से जोड़ें। टीस्ता जल-बंटवारे पर समझौता और Ganges Treaty के नवीनीकरण को प्राथमिकता दें।
SAARC को पुनर्जीवित करने का प्रयास करें, ताकि क्षेत्रीय सहयोग बढ़े और चीन-पाकिस्तान के प्रभाव को संतुलित किया जा सके।
5. बहुपक्षीय मंचों पर संतुलित दबाव
संयुक्त राष्ट्र, मानवाधिकार परिषद या अन्य मंचों पर अल्पसंख्यक उत्पीड़न को उठाएं, लेकिन इसे द्विपक्षीय संबंधों से अलग रखें।
वैश्विक दबाव (जैसे US के Magnitsky Act) का समर्थन करें, लेकिन खुद प्रतिबंध न लगाएं ताकि हस्तक्षेप का आरोप न लगे।
6. शेख हसीना के मुद्दे का संवेदनशील प्रबंधन
प्रत्यर्पण से इनकार जारी रखें (मौत की सजा और राजनीतिक आरोपों के कारण), लेकिन निजी तौर पर तीसरे देश में स्थानांतरण या राजनीतिक गतिविधियों पर रोक का विकल्प सुझाएं।
इससे BNP सरकार के साथ विश्वास बढ़ेगा, जो अल्पसंख्यक सुरक्षा पर सहयोग के लिए जरूरी है।
BNP की जीत से स्थिर सरकार बनने की संभावना है, जो हिंसा कम कर सकती है। लेकिन Jamaat-e-Islami की मजबूत उपस्थिति (मुख्य विपक्ष के रूप में) से सामाजिक दबाव बढ़ सकता है। भारत को हस्तक्षेप से बचते हुए सहयोगपूर्ण लेकिन दृढ़ कूटनीति अपनानी चाहिए—विश्वास बहाली, आर्थिक लाभ और संयुक्त तंत्र के माध्यम से। यदि ये कदम उठाए जाएं, तो हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा मजबूत होगी, सीमा स्थिर रहेगी और दोनों देशों के बीच “समान साझेदारी” का नया अध्याय शुरू हो सकता है। स्थिति अभी विकसित हो रही है, इसलिए निरंतर निगरानी और लचीलापन आवश्यक है।
