उज्जैन, 23 सितंबर। सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय उज्जैन में विश्व सांकेतिक भाषा दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में मुख्य अतिथि श्री ज्ञानेंद्र पुरोहित इंदौर ने सम्पूर्ण आयोजन के दौरान हर एक व्याख्यान, भाषण और संवाद के समय मूक बघिर की सांकेतिक भाषा का प्रस्तुतिकरण मंच पर लगातार खड़े रहकर समस्त अतिथियों और संचालन की हर विधा का प्रदर्शन साथ में करके सभी को अचंभित कर दिया, तभी अध्यक्षता कर रहे कुलगुरु प्रो अर्पण भारद्वाज को कहना पड़ा कि, विश्वविद्यालय के लिए आज का दिन ऐतिहासिक बन गया और इस सभागार में इंदौर,उज्जैन से सैकड़ों विद्यार्थियों की उपस्थिति हैं जिन्हें ईश्वर की विशेष योग्यता प्राप्त है।
उल्लेखनीय हैं कि, इंदौर के मूक बघिर ट्रेनर श्री ज्ञानेंद्र पुरोहित वह चर्चित नाम है जिन्हें अंतर्राष्ट्रीय ख्याति पाकिस्तान से भारत आई मूक बघिर गीता को मानसिक अवसाद से बाहर निकालने और उसके माता-पिता से मिलवाने की अहम भूमिका के कारण मिली थी।
सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय के स्वर्ण जयंती सभागार में विश्व सांकेतिक भाषा दिवस के अवसर पर “सांकेतिक भाषा के अधिकारों के बिना मानवाधिकार नहीं” विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा प्रकोष्ठ एवं मनोविकास विशेष शिक्षा महाविद्यालय, उज्जैन के संयुक्त तत्वावधान में संपन्न हुआ।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में आनंद सर्विस सोसायटी के सचिव ज्ञानेंद्र पुरोहित, विशेष अतिथि के रूप में सांकेतिक भाषा की मास्टर ट्रेनर प्रियंका साहू , तथा मनोविकास विशेष शिक्षा महाविद्यालय के निदेशक फादर टॉम जॉर्ज उपस्थित रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. अर्पण भारद्वाज ने की।
मुख्य अतिथि ज्ञानेंद्र पुरोहित ने अपनी डॉक्यूमेंट्री “खामोशी की गूंज” का प्रदर्शन किया। इस फिल्म में मूक-बघिर एवं दिव्यांग बच्चों की शिक्षा, प्रशिक्षण, प्रतिभा और उनके जीवन संघर्ष को दिखाया गया है। फिल्म ने उपस्थित दर्शकों को भावुक कर दिया और दिव्यांग बच्चों के अधिकारों एवं सम्मान की दिशा में नए दृष्टिकोण दिए। डॉक्यूमेंट्री निर्माण टीम को विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. भारद्वाज ने सम्मानित किया।साथ ही विश्वविद्यालय के द्वारा योग पर बनाई गई डॉक्यूमेंट्री “अनुगूंज” को भी प्रस्तुत किया गया। इससे बच्चों को योग संबंधित जानकारी समझाई गई। यह डॉक्यूमेंट्री विद्यार्थी कल्याण संकायाध्यक्ष एस.के. मिश्र के मार्गदर्शन में बनाई गई एवं सहयोग अनंत वर्मा, प्रीति सोनी का रहा।
अपने अध्यक्षीय संबोधन में विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. अर्पण भारद्वाज ने कहा कि सांकेतिक भाषा का महत्व केवल मूक-बघिर व्यक्तियों के लिए नहीं, बल्कि समाज के लिए भी अत्यंत जरूरी है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय आने वाले समय में ऐसे बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ने और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए विशेष प्रयास करेगा। उन्होंने विद्यार्थियों से अपील की कि वे मनोविकास केंद्र का भ्रमण करें और इसे केवल एक कार्यक्रम नहीं बल्कि सामाजिक अभियान के रूप में लें। साथ ही उन्होंने कहा कि हमें समाज में ऐसे बच्चों की पीड़ा को समझना होगा और उन्हें नृत्य, संगीत व अन्य गतिविधियों में समान अवसर देने होंगे।
विशेष अतिथि प्रियंका साहू ने सांकेतिक भाषा में अपना परिचय और वक्तव्य प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि सांकेतिक भाषा को सबको सीखना चाहिए ताकि समाज में संवाद की बाधाएँ कम हों और सभी को समान अवसर मिल सके। उनका संबोधन छात्रों और शिक्षकों के लिए प्रेरणादायी रहा।
भारतीय भाषा प्रकोष्ठ की समन्वयक प्रो. गीता नायक ने स्वागत भाषण में कहा कि बोलने में असमर्थ बच्चे हाथों के माध्यम से अपने विचार व्यक्त करते हैं और उनके लिए सांकेतिक भाषा ही संप्रेषण का प्रमुख माध्यम है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि जैसे ट्रैफिक पुलिस या अंपायर संकेतों से संदेश देते हैं, वैसे ही सांकेतिक भाषा में हाथ का विशेष महत्व है। उन्होंने साहित्यकार धर्मवीर भारती की कविता का उल्लेख करते हुए यह स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की यह विधा अत्यंत शक्तिशाली और मानवीय है।
कार्यक्रम में सांकेतिक भाषा की कार्यशाला भी आयोजित की गई, जिसमें मूक-बघिरों के लिए सभी को सांकेतिक भाषा का प्रशिक्षण दिया गया। इस अवसर पर बताया गया कि यह दिवस विशेष रूप से मूक-बघिरों के लिए मनाया जाता है। कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा सांकेतिक भाषा को शिक्षा नीति में शामिल किए जाने पर आभार व्यक्त किया गया। वर्तमान में पूरे विश्व में लगभग 200 से अधिक सांकेतिक भाषाओं का प्रयोग किया जाता है, जो विभिन्न देशों के आधार पर भिन्न-भिन्न होती हैं।
कार्यक्रम में मूक बघिर बच्चों की उपस्थिति मुख्य आकर्षण के रूप में रही। बच्चों द्वारा विशेष कला प्रदर्शन के रूप में प्रस्तुतीकरण दिया गया। कार्यक्रम में आभार व्यक्त हिमांगी पार्शल एवं संचालन श्री गोविंद छाबरवाल तथा विश्वविद्यालय की छात्रा महक नेमा द्वारा किया गया।
कार्यक्रम के अंत में भारत यात्रा के अंतर्गत विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने विभिन्न राज्यों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं। इनमें महाराष्ट्र का लोकनृत्य, मालवा नृत्य, छत्तीसगढ़ी लोकनृत्य, उत्तर भारत का कथक, दुर्गा पूजन आधारित बंगाली नृत्य, मणिपुरी, संबलपुरी, गुजरात का पारंपरिक गरबा और राजस्थानी लोकनृत्य प्रमुख आकर्षण रहे। इन प्रस्तुतियों ने भारत की सांस्कृतिक विविधता और समृद्धि का परिचय कराया। कार्यक्रम के अंत में राष्ट्रीय गान सांकेतिक भाषा में किया गया।