डॉ. महेन्द्र यादव की पाती थोड़ी जज़्बाती

एक दौर था…जब आसमान पर पीले-नारंगी रंग की सांझ उतरते ही गलियों में गूंजने लगते थे गीत—
“संजा तू थारा घर जा, कि थारी मां मारेगी के कूटेगी…”
कुंवारी कन्याएं दीवारों पर गोबर से बनी संजा की आकृतियों को रंग-बिरंगे फूलों और पत्तियों से सजाती थीं।
शाम होते ही मोहल्ले की हर लड़की थाली में दीप, चावल, फूल और जल लेकर संजा की पूजा करती, आरती गाती, और फिर संझा गीतों की टोलियां बन जातीं।
एक दौर था…
जब उज्जैन से लेकर मालवा के हर कोने में संजा के गीतों की गूंज थी,
जब बेटियां मायके लौटती थीं इस पर्व का उद्यापन करने के लिए,
जब एक दीवार की गोबर से बनी आकृति,
पूरे मोहल्ले को जोड़ देती थी एक रिश्ते में ,
भक्ति और सांस्कृतिक अपनत्व के साथ
और आज…?
अब तो दीवारें भी खाली हैं और दिल भी…
मोबाइल की स्क्रीन पर उंगलियां फिसलती हैं,
लेकिन संजा की आकृति अब उभरती नहीं।
वो गीत, जो पीढ़ियों तक सुनाए गए, अब Google पर भी नहीं मिलते।
वो चहक, वो हंसी, वो संझा की आरती – अब सिर्फ यादों में है।
मोबाइल ने सचमुच बहुत कुछ छीन लिया है –
केवल ध्यान ही नहीं,
हमारी जड़ों से जुड़ाव,
हमारी परंपराएं,
हमारा संस्कारों का व्यवहारिक पाठ।
शहर तो बहुत पहले चुप हो गए थे, अब गांव भी चुप होने लगे हैं।
कुछ गांवों में शायद अब भी बच्चियां संजा बनाती हों,
शायद कहीं अब भी कोई बूढ़ी दादी
छोटियों को संजा के गीत सिखा रही हो…
लेकिन वो भी कब तक?
📱 मोबाइल युग में खोती परंपराएं
मोबाइल ने संवाद दिया, लेकिन संवेदना छीन ली।
उसने कनेक्शन दिए, लेकिन संबंधों की गर्माहट छीन ली।
वो दुनिया से जोड़ता है, लेकिन जड़ों से तोड़ देता है।
श्राद्ध पक्ष – जो कभी आत्मीयता, श्रद्धा और संस्कृति से भरे रहते थे,
अब केवल फोन कॉल्स पर “तर्पण करा लिया?” तक सीमित हो गए हैं।
फिर भी आशा है…
हर परंपरा जब टूटती है, तो एक टीस छोड़ती है।
शायद ये टीस ही कभी जागृति बने।
शायद कोई माँ अपनी बेटी को फिर से संजा बनाना सिखा दे,
शायद कोई स्कूल इसे फिर से “folk culture” के रूप में सिखा दे।
क्योंकि संजा कोई पर्व नहीं,
संस्कृति की मिट्टी में उगी एक स्मृति है।
जो जिंदा रहे, तो पीढ़ियां जिंदा रहेंगी।
“अब तो जाओ संजा बई सासरे, हम तो नी जावा दादाजी सासरे…”
इन गीतों की मिठास मोबाइल के स्पीकर में नहीं,
दिलों की धड़कनों में होती थी।
आप भी सोचिए,
क्या बच पाएगी संजा,
या मोबाइल सचमुच… सब कुछ छीन ले गया?
