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संजय अग्रवाल
वंदे मातरम भारत की सांस्कृतिक और भावनात्मक पहचान का सबसे शक्तिशाली प्रतीक है। यह गीत बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित है, जो 1870 के दशक में लिखा गया और 1882 में उनके उपन्यास आनंदमठ में प्रकाशित हुआ। यह ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ एकजुट होने का आह्वान था, जिसमें भारत को माँ के रूप में देखा गया – मातृभूमि के प्रति प्रेम और समर्पण का प्रतीक। स्वतंत्रता संग्राम में यह गीत लाखों क्रांतिकारियों की जुबान पर चढ़ा, जेलों में गूंजा और राष्ट्रवाद की धड़कन बना।
पूर्ण वंदे मातरम गीत (सात छंदों सहित):
वन्दे मातरम्!
सुजलाम् सुफलाम् मलयजशीतलाम्
शस्यश्यामलाम् मातरम्।
वन्दे मातरम्॥
शुभ्रज्योत्स्ना पुलकितयामिनीम्
फुल्लकुसुमितद्रुमदलशोभिनीम्
सुहासिनीं सुमधुरभाषिणीम्
सुखदाम् वरदाम् मातरम्॥
वन्दे मातरम्॥
कोटि-कोटि कण्ठ-कल-कल-निनाद-कराले
कोटि-कोटि भुजैर्धृत-खरकरवाले
के बोले मा तुमि अबले
बहुबल-धारिणीं नमामि तारिणीम्
रिपुदलवारिणीं मातरम्॥
वन्दे मातरम्॥
तुमि विद्या तुमि धर्म
तुमि हृदि तुमि मर्म
त्वं हि प्राणाः शरीरे
बाहुते तुमि मा शक्ति
हृदये तुमि मा भक्ति
तोमारै प्रतिमा गडि मन्दिरे-मन्दिरे मातरम्॥
वन्दे मातरम्॥
त्वं हि दुर्गा दशप्रहरण-धारिणी
कमला कमल-दल-विहारिणी
वाणी विद्या-दायिनी नमामि त्वाम्
नमामि कमलाम् अमलां अतुलाम्
सुजलां सुफलां मातरम्॥
वन्दे मातरम्॥
श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषिताम्
धरणीं भरणीं मातरम्॥
वन्दे मातरम्॥
भारतीयता से जुड़ाव: वंदे मातरम राष्ट्रवाद का सार है
भारतीयता का अर्थ है विविधता में एकता – हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध सब मिलकर एक राष्ट्र। वंदे मातरम इस एकता का प्रतीक है क्योंकि:
यह मातृभूमि को माँ मानता है, जो भारतीय संस्कृति की गहराई में बसी है। जैसे हम माँ-बाप का सम्मान करते हैं, वैसे ही देश को माँ मानना पूजा नहीं, कृतज्ञता और प्रेम है।
राष्ट्रगान जन गण मन (रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा) के साथ वंदे मातरम पूरक है। जन गण मन ईश्वर को राष्ट्र का विधाता मानता है, जबकि वंदे मातरम मातृभूमि को माँ के रूप में। दोनों मिलकर भारतीयता की दो धाराएँ हैं – एक आध्यात्मिक एकता, दूसरी मातृ-सम्मान।
स्वतंत्रता संग्राम में हिंदू-मुस्लिम एक साथ गाते थे। मौलाना अबुल कलाम आजाद, खान अब्दुल गफ्फार खान जैसे मुस्लिम नेता भी राष्ट्रप्रेम में शामिल थे। विरोध मुख्य रूप से मुस्लिम लीग और कुछ उलेमाओं से आया, जो दो-राष्ट्र सिद्धांत चाहते थे।
विरोध पर तार्किक विश्लेषण – क्यों गलत है जबरदस्ती या विभाजन?
हाल के वर्षों में (2026 तक) केंद्र सरकार ने नए प्रोटोकॉल जारी किए हैं, जिसमें सरकारी कार्यक्रमों, स्कूलों में वंदे मातरम के पूर्ण या निर्धारित छंद गाने अनिवार्य हैं। कुछ मुस्लिम नेता (जैसे मौलाना साजिद रशीदी, जमीअत उलेमा, AIMIM नेता) विरोध कर रहे हैं – कहते हैं कि कुछ छंद (दुर्गा, कमला आदि) इस्लाम के तौहीद (एकेश्वरवाद) के खिलाफ हैं, शिर्क हैं, और अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) का उल्लंघन है। वे कहते हैं, “सिर कट जाए लेकिन नहीं गाएंगे।”
लेकिन तर्क से देखें:
सुजलाम् सुफलाम्… – सिर्फ नदियाँ, फसलें, प्रकृति का वर्णन। कोई देवी नाम नहीं। इन्हें गाना किसी की आस्था पर हमला नहीं।
भारतीय संविधान और कर्तव्य: अनुच्छेद 51A(a) कहता है – संविधान का पालन, राष्ट्रध्वज-राष्ट्रगान का सम्मान करना मौलिक कर्तव्य है। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि जबरदस्ती नहीं, लेकिन सम्मान जरूरी। वंदे मातरम राष्ट्रगीत है, पूजा नहीं। जैसे “भारत माता की जय” कहना देशभक्ति है, वैसे ही।
धार्मिक स्वतंत्रता vs राष्ट्र एकता: अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता देता है, लेकिन राष्ट्र विरोधी नहीं। अगर कोई “अल्लाहु अकबर” कहने से , मतलब विविधता में एकता, प्रेम में समर्पण, और मातृभूमि के प्रति अटूट निष्ठा ( लेखक वर्ल्ड हिंदू फेडरेशन की मध्यप्रदेश इकाई के अध्यक्ष है।)
