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इस कहावत पर “मन चंगा, तो कटौती में गंगा” यह बेहद प्रसिद्ध कहानी विश्व विख्यात हुई, रविदास जयंती पर इसके गुणगान किया जाते हैं l
इस वर्ष 12 फरवरी को संत रविदासजी की जयंती पूरे देश में संत की इस सीख के साथ मनाई जा रही है की “ कुछ बुरे लोग गलत काम ही करेंगे, हमें यह तय करना चाहिए कि हम बुरे लोगों की वजह से अपनी अच्छाई नहीं छोड़ेंगे।” संत रविदास अपने विचारों और अपने प्रेरक जीवन की वजह से आज भी याद किए जाते हैं। जो लोग उनके विचारों व उपदेशों को अपने जीवन में उतार लेते हैं, वह अनेकों परेशानियों से बच सकते हैं और उनके जीवन में सुख शांति बनी रह सकती है।
भारत देश में मध्य काल के दौरान सामाजिक असमानता, आर्थिक दरिद्रता और राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति के साथ समाज में व्याप्त कुरीतियों के बोलबाले को समाप्त करने के लिए संत शिरोमणि श्री रविदास जी महाराज जैसे महापुरुष संवत 1433 की माघी पूर्णिमा को ज्ञान और वैराग्य की शाश्वत भूमि काशी में सुसंपन्न चर्मकार कुल में अवतरित हुए। जिस दिन संत रविदास जी का अवतरण हुआ उस दिन रविवार था, इस कारण उन्हें रविदास कहा गया। संत रविदास की जन्म स्थली वाराणसी (काशी) उत्तरप्रदेश थी। उनके गुरु काशी के पंडित रामानंदजी एवं शिष्या चित्तौड़ की रानी झाली व कृष्ण भक्त मीराबाई थी। इस प्रकार रविदासजी भारत की 15 वी शताब्दी के एक महान संत, दर्शनशास्त्री, कवि, समाजसुधारक और ईश्वर के सच्चे अनुयायी थे।
उन्होंने समस्त मानव समाज को मानवता और कर्मत्व की शिक्षा दी। उनकी वाणी बेहद सारगर्भित, अनूठी और प्रभावशाली थी। वे जीवन का मर्म जानते थे और इस मर्मज्ञान के माध्यम से ही उन्होंने समाज को जागृत करने एवं नई दिशा दिखाने का भरपूर प्रयास किया। वे समतामूलक समाज की रचना में विश्वास रखते थे और कहते थे कि जन्म के आधार पर कोई भी मनुष्य ऊंचा या नीचा नहीं होता है, अपितु मनुष्य का व्यवहार ही उसे ऊंचा या नीचा बनाता है। संत रविदास जी ने जन्म के आधार पर होने वाले भेदभाव की घोर आलोचना की, उन्होंने कहा कि मनुष्य ने जातियों के भीतर अनेक जातियां बना दी जिसका कोई आधार नहीं है। जब तक यह जाति का भेदभाव रहेगा तब तक मनुष्य एक दूसरे से नहीं जुड़ पाएंगे। वे एक ऐसे सुशासन की मंशा रखते थे जिसमें प्रत्येक मनुष्य को अन्न व न्याय उपलब्ध हो। वे कहते थे कि अमीर तथा गरीब में आर्थिक विषमता की खाई को समाप्त करके ऐसे राज्य की स्थापना करके ही मुझे खुशी मिलेगी।
वे इतने दयालु प्रवृत्ति के थे कि जो भी संत या फकीर उनके द्वार पर आता था वे उससे बिना पैसे लिए ही उन्हें अपने हाथों से बने जूते पहना देते थे। वे हर काम पुरी लगन और श्रद्धा से करते थे। संत ने अपने कर्म और वचनों से सभी को भक्ति, परोपकार और भाईचारे का संदेश दिया। उन्होंने मनुष्य को सुख और शांतिपूर्वक जिले के लिए दो ही स्थान बताएं एक स्वराज्य और दूसरा शमशान। उन्होंने अपनी आत्मा को कभी भी धन या प्रसिद्धि का दास नहीं बनने दिया एवं पुरुषार्थ के स्थान पर कभी भी अकर्मण्यता को स्वीकार नहीं किया। मन की पवित्रता उनके लिए मानव जीवन का सच्चा जीवन लक्ष्य थी, इसलिए “मन चंगा तो कठौती में गंगा” जैसे सुविचार उन्होंने क्रियान्वित करके भी दिखाएं।
संत के अनेकों प्रसंग है जिसमें उनके चमत्कारों का वर्णन भी मिलता है। रविदासजी अंधविश्वास, आडंबर और कर्मकांड को निरर्थक मानते थे। उनकी भक्ति साधना में विनम्रता तथा प्रेम की प्रधानता थी। उन्होंने आचरण की पवित्रता पर विशेष बल दिया। संत रविदास गुरु महिमा और सत्संग के समर्थक थे। वे मानते थे कि सत्संगति के बिना भगवान से प्रेम नहीं हो सकता और भगवतप्रेम के बिना मुक्ति नहीं हो सकती। वे क्रोध, लोभ, माया, मोह एवं अहं को त्याज्य मानते थे।
गुरु रविदास को गुरु रैदास के नाम से भी पुकारा गया एवं इन्हें संत शिरोमणि की उपाधि दी गई।
उनके अधिकांश अनुयायी सिख धर्म का पालन करते थे और श्री गुरु ग्रंथ साहिब में आस्था रखते थे। रविदास जी का यह अनुयायी संप्रदाय मुख्य रूप से पंजाब के मालवा क्षेत्र में निवास करता है। रैदास ने अपनी काव्य रचनाओं में सरल, व्यावहारिक ब्रज भाषा का प्रयोग किया जिसमे राजस्थानी, खड़ी बोली, अवधी भाषा, एवं उर्दू तथा फ़ारसी शब्दो का भी मिश्रण रहा। उनके अनेकों दोहे तथा उक्तियाँ प्रचलित रही जो आज भी जीवंत मानी जाती है।
रैदास की भक्ति सेवक और मालिक के समान है। जिस प्रकार सेवक अपने मालिक की भक्ति करता है और अपना पूरा जीवन उस मालिक की भक्ति में लगा देता है, उन्होंने ठीक वैसा ही जीवन जिया। वे भाईचारे को ही सच्चा धर्म मानते थे। उनकी भक्ति से हमें दूसरों की सहायता करने की सीख मिलती है जिससे आत्मज्ञान का मार्ग प्रशस्त होता है। रैदास की वाणी भक्ति की सच्ची भावना, समाज के व्यापक हित की कामना एवं मानव प्रेम से ओतप्रोत थी इसलिए उनका श्रोताओं के मन पर गहरा प्रभाव पड़ता था। उनके भजनों तथा उपदेशो से लोगों को ऐसी शिक्षा मिलती थी जिससे उनकी शंकाओं का संतोषजनक समाधान हो जाता था एवं लोग स्वतः ही उनके अनुयायी बन जाते थे।
डॉ. बी.आर. नलवाया,
वरिष्ठ उपाध्यक्ष, ओसवाल छोटे साथ, जैन समाज ,मंदसौर
