आज विश्व रेडियो दिवस – 13 फरवरी पर विशेष
आज विश्व रेडियो दिवस मनाने की पहल स्पेन रेडियो एकेडमी ने पहली बार 2010 में की । उसके बाद 2011 ने यूनेस्को की महासभा के 36 वें सत्र में हर साल 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस मनाने की घोषणा हुई । इसके बाद 2012 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इसकी मंजूरी दी ।
जमाना चाहे कितना भी आधुनिक हो जाए लेकिन रेडियो का दौर आज भी लोगों के जेहन में मधुर संगीत की तरह तरोताज़ा करता रहता है ,निश्चित ही मन आनंदित और प्रफुल्लित हो जाता है। क्योंकि सूचना के आदान प्रदान, लोगों को शिक्षित व जागरूक करने उनका मनोरंजन करने से लेकर बच्चों, किशोरों एवं युवाओं को अपनी बात कहने का एक मंच दिया है ।
यह विदित है की भारतवर्ष में 1924 में मद्रास प्रेसीडेंसी रेडियो क्लब के द्वारा पहली बार रेडियो कार्यक्रमों की शुरुआत की गई । 1927 में बंबई (मुंबई) में इंडियन ब्रॉड कास्टिंग कंपनी की स्थापना हुई और इसमे बंबई और कलकत्ता (कोलकाता) में एक साथ कार्यक्रमों का प्रसारण किया गया । 1932 में भारत सरकार ने सूचना और प्रसारण मंत्रालय की स्थापना की और उनके द्वारा ऑल इंडियन रेडियो की सेवाओं को प्रारंभ किया गया। आकाशवाणी के द्वारा घरेलू और विदेशी दोनों ही सेवाओं से संबन्धित कार्यक्रमों का प्रसारण किया जाता है।
1947 में भारत की स्वतंत्रता के समय ऑल इंडिया रेडियो के केवल 6 केंद्र थे। 4 जनवरी, 2023 की स्थिति में आकाशवाणी के 500 से अधिक प्रसारण केन्द्रों संचारण होता है। केंद्र सरकार ने 2,500/- करोड़ रूपये से अधिक की राशि इन केन्द्रों के बुनियादी ढांचे को मजबूत कर के दूर दराज के इलाकों मे भी इनका प्रसारण सुधारने के लिए पूर्व के वर्षों में कैबिनेट की बैठक में फैसला लिया गया । बुनियादी ढांचे की विस्तार और अब अपग्रेड़शन के तहत आकाशवाणी के एफ़एम रेडियो स्टेशनों के प्रसारण क्षेत्र का दायरा बढ़ाने और नक्सल वाद प्रभावित क्षेत्रों तक जागरूकता लाने के अवसर दिये गए । आकाशवाणी के एफ़एम चेनलों की कवरेज देश की 80% आबादी तक बढ़ाना भी है, भौगोलिक क्षेत्र के हिसाब से इसका विस्तार 66% तक किया जाएगा । देश में एफएम रेडियो के माध्यम से कई जानकारियां जनता को मिलती है विशेष तौर से व्यावसायिक जानकारी जिसमें कम कीमत पर दुकानदार जो माल देता है, उसकी जानकारी भी एफएम रेडियो देता है। रेडियो में एफएम रेडियो का बहुत बड़ा प्लेटफार्म है। एफएम रेडियो पर दो आर जे जब स्थानीयकृत बोली में अपनी जिंदगी से जुड़ी बातें करते थे, तब कुलदीप उसे बहुत ध्यान से सुनते थे। रेडियो के जानकार मनोज कुमार का कहना है कि अपनी भाषा संस्कृति को बचाने की दिशा में छोटे-छोटे रेडियो स्टेशन बड़ा काम कर रहे हैं, यह उल्लेखनीय की सरकारी रेडियो आकाशवाणी का पहले पूरे भारत में एक छत्र राज हुआ करता था। इसके बाद समय के साथ निजी एफएम रेडियो की संख्या बढ़ती गई, तो आकाशवाणी से इसके मुकाबले के लिए विविध भारती को खड़ा किया है, अब तो यह स्थिति है, कि मंदसौर जैसे शहर में भी एक रेडियो जो निजी रेडियो चैनल कहलाता है, उस पर ज्ञानवर्धक जानकारी से लेकर मनोरंजन तक की सामग्री परोसी जाती हैं, अब एफएम चैनल भी मोबाइल, पॉकेट रेडियो के तौर पर खूब चल रहा है। कोरोना काल में जब सब कुछ बंद था, तब रेडियो ने शहर ही नहीं बल्कि छोटे गांव में भी लोगों को जागरूक करने का प्रयास किया, तब रेडियो ने लोगों में सकारात्मक फैलाई, अब ऐसा आभास होने लगा है, कि एफएम रेडियो के जरिए युवाओं में भी इसकी लोकप्रियता बढ़ायी जाना चाहिए।
आज नवीन तकनीक के दौर में भी रेडियो का महत्व कम नहीं हुआ, पहले भारतीय प्रसारण सेवा, फिर आल इंडिया रेडियो इसके बाद आकाशवाणी के रूप में रेडियो अस्तित्व में रहा । विविध भारती और एफ़एम प्रसारण में मनोरंजन को नई दिशा दी , अब एक और नया आयाम कम्यूनिटी रेडियो लगातार विस्तार की ओर अग्रेषित है । इस समय मध्य प्रदेश में कई कम्यूनिटी रेडियो स्टेशन कार्यरत है । जिनमे 8 आदिवासी क्षेत्रों में सूचना और शिक्षा के साथ अपनी संस्कृति से जोड़े रखने में जुटे है । वर्ष 2008 के आस पास इस प्रदेश के चँदेरी में कम्यूनिटी रेडियो की शुरुआत हुई ।
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी अपने “मन की बात” को रेडियो के प्रसारण को प्राथमिकता देते है । उनका मानना है की रेडियो विरासत और आदत का हिस्सा है । कार्यक्रम की लोकप्रियता भी बढ़ी है । अब 2024 से डिजिटल रेडियो की योजना है । हाल ही में प्राइवेट एफ़एम को आकाशवाणी बुलेटिन रि-ब्रॉडकास्ट करने की अनुमति तो है ही, रेडियो दिवस के अवसर पर यह तय किया गया था की एफ़एम रेडियो आकाशवाणी के बुलेटिन को अपनी आवाज़ में पेश कर सकते है ।
आकाशवाणी से रेडियो के माध्यम से बच्चों, महिलाओं, औध्योगिक मजदूरों, विज्ञान, कृषि तथा गृह इकाई, युवा वर्ग, नई शिक्षा नीति, खेल और मौसम के विशेष कार्यक्रम के प्रसारण के साथ ही घरेलू सेवाओं में शास्त्रीय, लोक, सुगम, भक्ति, फिल्मी, और पश्चिम संगीत, वाघवृंद तथा समूह गायन मंडली, पुराने संगीत के रेकॉर्ड, कवि सम्मेलन, रूपक, नाटक, राष्ट्रिय एकता एवं परिवार कल्याण के कार्यक्रम भी प्रसारित होते रहते है । गुट निरपेक्षता, सांप्रदायिक सद्भाव , स्वास्थ्य, ऊर्जा की बचत, पिछड़े वर्गों का उत्थान, पर्यावरण संरक्षण, लोक तंत्र , न्याय संगत प्रगति, गरीबी, बेरोजगारी आदि पर अनेक विषयों पर अनेकों बार वार्ताएं एवं परिचर्चाएँ होती रहती है और आम जनता में जागरूकता और शिक्षा प्रदान की जाती है । रेडियो दिवस के अवसर पर रेडियो से आप सभी लाभान्वित होते रहें ।
डॉ. बी.आर. नलवाया
शोध निर्देशक-वाणिज्य विभाग
शासकीय पीजी महाविध्यालय – मंदसौर
मो. 9826769449
