एयरलांइस 6 प्रतिशत करती हैं गैसों का उत्सर्जन
नईदिल्ली । यूरोपीय पार्लियामेंट ने ऐलान किया है कि 2025 से एयर ट्रैवल पर एनवायरमेंटल लेबल लगाकर यात्रियों को उनकी फ्लाइट्स के कार्बन फुटप्रिंट की जानकारी दी जाएगी। हवाई यात्रा के दौरान विमानों के ईंधन जलाने पर बनने वाले कॉन्ट्रेल्स में केरोसीन मिला होता है। करीब 12 किमी की ऊंचाई पर कम तापमान के कारण विमानों की छोड़ी गई ये कालिख घंटों तक हवा में बर्फ के क्रिस्टल्स के तौर पर बने रहते हैं।ये कॉन्ट्रेल्स ग्रीनहाउस गैसों की तरह वायुमंडल में गर्मी को रोक लेते हैं।कुछ शोधों के मुताबिक, कॉन्ट्रेल्स कार्बन डाइऑक्साइड के मुकाबले 1.7 गुना ज्यादा खतरनाक होते हैं।साफ है कि फ्लाइट्स का हमारी जलवायु पर बुरा असर पड़ता है.अब सवाल ये उठता है कि विमान के छोड़े गए कॉन्ट्रेल्स को बनने से कैसे रोका जा सकता है।
इसके लिए एयरक्राफ्ट को करीब 1000 मीटर नीचे उड़ाया जाना चाहिए।दरअसल, इस ऊंचाई पर तापमान अपेक्षाकृत कम होता है।वहीं, फ्लाइट्स ऐसे रूट से जा सकती हैं, जहां का मौसम कॉन्ट्रेल्स के बनने में मदद ना करे।ऐसे रूट्स ढूंढने के लिए सैटेलाइट से जानकारी हासिल की जा सकती है।इसे ग्लोबल वार्मिंग के लिए जिम्मेदार चीजों में 30 से 80 फीसदी तक की कमी लाई जा सकती है.फ्लाइट्स में ई-केरोसीन का इस्तेमाल किया जा सकता है।दरअसल, ई-केरोसीन का उत्पादन ग्रीन इलेक्ट्रिसिटी, पानी और हवा से मिली कार्बन डाइऑक्साइड के जरिये क्लाइमेट न्यूट्रल तरीके से किया जा सकता है।इस प्रक्रिया में सबसे पहले इलेक्ट्रोलिसिस के जरिये हाइड्रोजन पैदा की जाती है।
फिर सिंथेटिक ई-केरोसीन बनाने के लिए उसमें कार्बन डाइऑक्साइड मिलाई जाती है।सस्ता रखने के लिए ई-केरोसीन को सौर और पवन ऊर्जा की अधिकता में बनाया जा सकता है। एयरक्राफ्ट्स के लिए दूसरा विकल्प बायोकेरोसीन भी है।इसे सरसों के बीजों, जट्रोफा के बीजों या पुराने खाद्य तेलों से बनाया जा सकता है।इसके लिए छोटे पैमाने पर उत्पादन यूनिट्स पहले से ही हैं।ज्यादा मांग को पूरा करने के लिए ज्यादा उत्पादन की जरूरत पड़ेगी।बायोकेरोसीन के ज्यादा उत्पादन के लिए कृषि योग्य भूमि की भी जरूरत होगी।यूरोपीय आयोग के प्रस्ताव के तहत साल 2025 तक बायोफ्यूल और ई-केरोसीन को फॉसिल केरोसीन ऑयल के साथ मिलाया जा सकता है।मिश्रण में बायोफ्यूल्स की मात्रा हर साल 2 फीसदी बढ़ाई जा सकेगी।फ्लाइट्स इलेक्ट्रिक इंजन और बैटरी के जरिए ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन व कॉन्ट्रेल्स से बच सकती हैं।
हालांकि, समस्या ये है कि अभी उपलब्ध बैटरियों का विमानों में इस्तेमाल करने पर कम दूरी की यात्राएं ही की जा सकती हैं।अभी दुनियाभर में कई कंपनियां ऐसी बैटरियों को बनाने की प्रक्रिया में हैं, जो विमानों के लिए उपयोगी साबित हो सकें।इजरायल की कंपनी एविएशन एयरक्राफ्ट पूरी तरह से बिजली आधारित 9 सीटर विमान बना रही है।यह निजी विमान 400 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से 445 किमी की उड़ान भर सकेगा।कुछ छोटे विमान ईंधन के तौर पर हाइड्रोजन का इस्तेमाल करते हैं।इससे बिजली पैदा होती है और विमान के प्रोपेलर्स को ऊर्जा मिलती है।लंबी दूरी के विमानों के इंजन में भी हाइड्रोजन का इस्तेमाल हो सकता है।
यूरोपीय एयरक्राफ्ट मैन्युफैक्चरर एयरबस 2035 तक हाइड्रोजन से चलने वाले यात्री विमान लॉन्च करने की योजना पर काम कर रही है।ग्लोबल कंसल्टिंग फर्म मैककिन्से के मुताबिक, 2050 तक वैश्विक हवाई यात्राओं में इनकी हिस्सेदारी 30 फीसदी से ज्यादा हो सकती है। बता दें कि कोरोना महामारी की रफ्तार बेहद कम होने के बाद से एयर ट्रैफिक में फिर तेजी से बढ़ोतरी हो रही है।जैसे-जैसे फ्लाइट्स की संख्या में इजाफा हो रहा है, वैसे-वैसे एयरलाइंस के ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में फिर से वृद्धि हो रही है।
