नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों से इस बारे में जवाब मांगा कि क्या राज्यपाल दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 433-ए के नियमों के बाद भी दोषियों को सजा में सामूहिक छूट दे सकते हैं, जिसके तहत उम्रकैद की सजा पाने वाले एक दोषी शख्स को 14 साल जेल में बिताने के बाद ही माफी दी जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में फैसला सुनाया है, कि अदालत द्वारा जघन्य अपराधों में दोषी को आजीवन कारावास की सजा का मतलब है कि अपराधी को अपना शेष जीवन जेल में बिताना अनिवार्य किया गया था। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह फैसला सीआरपीसी की धारा 433-ए के तहत 14 साल की कैद से गुजरने के बाद सजा को माफ करने की राज्य की शक्ति को खत्म नहीं करेगा।
कई मौकों पर राज्य सरकारों की सलाह पर कार्य करते हुए संबंधित राज्यों के राज्यपालों ने स्वतंत्रता दिवस जैसे विशेष मौके पर कैदियों को सजा में सामूहिक छूट देने के लिए संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत अपनी क्षमा और छूट की शक्तियों का प्रयोग किया था। जब एक हत्या के दोषी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी, तब उस हरियाणा के राज्यपाल ने अपनी अनुच्छेद 161 की शक्तियों का प्रयोग करते हुए केवल आठ साल की कैद के बाद 1998 में रिहा कर दिया था। इस निर्णय की वैधता की जांच करने वाली तीन जजों की पीठ ने इस सवाल को पांच जजों की बेंच को भेज दिया था।
सवाल ये था कि ‘क्या संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत मिली शक्ति का प्रयोग कर एक नीति बनाई जा सकती है, जहां कुछ निश्चित नियम या शर्तों को तय किया जा सकता है, जिनके पूरा होने पर कार्यपालिका द्वारा किसी भी मामले के संबंध में तथ्यों या सामग्री को राज्यपाल के सामने रखे बिना सजा में छूट का लाभ मिल सकता है। और क्या इस तरह की व्यवस्था संहिता की धारा 433-ए के तहत तय जरूरतों को खत्म कर सकती है।
