डॉ.महेन्द्र यादव की पाती थोड़ी जज्बाती
हिन्दी साहित्य बड़ा अभागा रहा है।
जिस युग में रामधारी सिंह ‘दिनकर’ राष्ट्र की आत्मा लिख रहे थे,
हरिशंकर परसाई समाज की खाल उधेड़ रहे थे,
महादेवी मौन में क्रांति रच रही थीं,
बच्चन आत्मा की बेचैनी को काग़ज़ पर उतार रहे थे,
प्रेमचंद इंसान को इंसान बना रहे थे,
ग़ालिब और मीर भाषा को इबादत बना चुके थे—
उसी परंपरा की लंबी छाया में आज कोई माइक पकड़कर खुद को ‘युगकवि’ घोषित कर दे,
तो इसे साहित्य का दुर्भाग्य न कहें तो क्या कहें?
किसी ने सही ही कहा है—
हर तालियाँ बटोरने वाला कलाकार कवि नहीं होता,
और हर वायरल होने वाला कवि युग नहीं बनाता।
युग कैसे बनता है?
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिन्दी साहित्य को कालखंडों में बाँटा।
युग वहाँ बने जहाँ—
भाषा बदली,
दृष्टि बदली,
और समाज का सोचने का ढंग बदला।
भारतेंदु युग आया क्योंकि भारतेंदु ने हिन्दी को नई चेतना दी।
द्विवेदी युग इसलिए बना क्योंकि द्विवेदी ने भाषा को अनुशासन दिया।
छायावाद इसलिए हुआ क्योंकि कविता भीतर की यात्रा पर निकल पड़ी।
अब ज़रा ठहरकर पूछिए—
कुमार विश्वास ने हिन्दी कविता को क्या दिया?
नई भाषा? नहीं।
नई दृष्टि? नहीं।
नई संवेदना? नहीं।
हाँ—
नई लाइटिंग,
नया साउंड सिस्टम
और नई एंकरिंग शैली ज़रूर दी।
कवि सम्मेलन : कविता से कॉन्सर्ट तक
कवि सम्मेलन कभी विचार का मंच हुआ करता था।
अब वह इवेंट मैनेजमेंट की शाखा बन चुका है।
जहाँ कविता से ज़्यादा ज़रूरी है—
पंचलाइन,
टाइमिंग,
कैमरा एंगल
और तालियों का प्री-रिकॉर्डेड भरोसा।
इस पतन को ‘उत्कर्ष’ वही कह सकता है
जो कविता को कंटेंट
और कवि को सेलिब्रिटी मान बैठा हो।
डिजिटल युग ≠ साहित्यिक युग
यह तर्क दिया जाता है कि—
“डिजिटल दौर में सबसे ज़्यादा देखे-सुने जाने वाले कवि कुमार विश्वास हैं।”
बिल्कुल!
लेकिन सबसे ज़्यादा देखे जाने वाले वीडियो में
डांस रील भी होती है
और झगड़े भी।
तो क्या अगला साहित्यिक युग
रील युग, व्यू युग या एल्गोरिद्म युग कहलाएगा?
लोकप्रियता बाज़ार का पैमाना है,
साहित्य का नहीं।
जनकवि या जनप्रिय कलाकार?
जनकवि वह होता है
जो जनता के सवाल लिखे,
न कि जनता से सवाल पूछे बिना
तालियाँ वसूल करे।
अगर सिर्फ लोकप्रियता से युग तय होने लगे,
तो फिर—
मुन्ना माइकल नृत्य-युग बना दे
और स्टैंडअप कॉमेडियन व्यंग्य-युग के शिखर पर बैठ जाएँ।
साहित्य इतना सस्ता नहीं होता।
तो फिर सच में ‘युग कवि’ कौन?
यहीं एक ज़रूरी फर्क समझना होगा।
बशीर बद्र, राहत इंदौरी और मुनव्वर राणा,अशोक चक्रधर, सुरेन्द्र शर्मा,हरिओम पंवार, शेल चतुर्वेदी, काका हाथरसी,ओम प्रकाश आदित्य जैसे कवि
इसलिए सम्मान के अधिकारी हैं क्योंकि
वे मंचीय लोकप्रियता और साहित्यिक गहराई—
दोनों कसौटियों पर खरे उतरते हैं।
और अगर “युग कवि” शब्द का नैतिक व साहित्यिक अर्थ देखा जाए,
तो इतिहास हमें कुछ और नाम सौंपता है—
दुष्यंत कुमार—
जिन्होंने ग़ज़ल को आंदोलन की भाषा दी,
सत्ता, समाज और नागरिक से सीधा संवाद किया।
यह समकालीन प्रतिरोध का युग था।
निदा फ़ाज़ली—
जिन्होंने साधारण शब्दों में गहरी दार्शनिक चोट की,
और आम आदमी की आत्मा लिखी।
यह मानवीय संवेदना का युग था।
शहरयार—
जिन्होंने प्रेम को शोर नहीं, संयम दिया।
यह गरिमा और गहराई का युग था।
कैफ़ी आज़मी और साहिर लुधियानवी—
जिन्होंने कविता को सामाजिक जिम्मेदारी दी
और असहमति को भाषा।
यह प्रतिबद्ध साहित्य का युग था।
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़—
जिन्होंने इंक़लाब को इश्क़ से जोड़ा
और पूरी उपमहाद्वीपीय चेतना को छुआ।
यह उर्दू की अंतरराष्ट्रीय आत्मा थी।
केदारनाथ सिंह और भवानी प्रसाद मिश्र—
जिन्होंने शोर के बिना समय दर्ज किया।
यह शांत, स्थायी कविता का युग था।
गोपालदास नीरज और अदम गोंडवी—
जिन्होंने मंच को गरिमा दी
और जन-यथार्थ को बिना चमक-दमक के कहा।
इन सबमें एक बात समान थी—
👉 इन्होंने युग को बदला,
युग ने इन्हें नहीं बनाया।
तो ‘विश्वास युग’ क्या है?
अगर इसे युग कहना ही है,
तो ईमानदारी से कहना चाहिए—
यह कविता का नहीं, तालियों का युग है।
यह भाषा का नहीं, ब्रांडिंग का युग है।
यह साहित्य का नहीं, स्पॉन्सर्ड संवेदना का युग है।
और इस युग में कवि नहीं होते,
परफ़ॉर्मर होते हैं।
अंत में
दिनकर, परसाई, बच्चन, महादेवी, तुलसी, सूर, रसखान, प्रेमचंद,
ग़ालिब, मीर, राहत, मुनव्वर, बशीर—
इन सबके बीच
किसी मंचीय चाटुकार का खुद को ‘युगकवि’ कहना
और उसके अनुयायियों का उसे युग सौंप देना—
यह साहित्य नहीं,
आत्ममुग्धता का उत्सव है।
