(अमिताभ पाण्डेय)
समय के साथ बदलती तकनीक ने सूचनाओं को प्राप्त करना बहुत आसान बना दिया है ।
सूचनाओं के प्रसार के लिए तकनीक पर आधारित जो साधन हैं , रेडियो उनमें सबसे पुराना है। दुनिया में रेडियो को आए 100 साल से भी अधिक हो गए।
रेडियो ने जरूरी संदेश तत्काल पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है ।
कभी अमीर लोगों की शान माने जाने वाला रेडियो अब हर खास और आम आदमी के लिए आसानी से उपलब्ध है।
अब तो मोबाइल पर भी रेडियो खूब सुना जा रहा है।
इसे सोशल मीडिया के यूट्यूब, टि्वटर , इंस्टाग्राम ,फेसबुक आदि पर भी सुना जा सकता है ।
रेडियो के जो नए रूप हैं , उनमें सामुदायिक रेडियो, डिजिटल रेडियो ,एफएम रेडियो, हेम रेडियो भी खूब पसंद किए जा रहे हैं।
रेडियो ने बीते 100 वर्षों में उपयोगी सूचनाओं, मनोरंजन, शिक्षाप्रद जानकारी का प्रसार किया इसलिए रेडियो का महत्व आज भी कायम है।
रेडियो की खासियत यह है कि आप इसे सुनते हुए भी अपने जरूरी कामकाज आसानी से कर सकते हैं ।
यह टेलीविजन की तरह आपको सब कुछ छोड़ कर बैठे~ बैठे देखने ~ सुनने के लिए मजबूर नहीं करता।
रेडियो सुख-दुख सबका साथी है। यह गीत ,संगीत ,शैक्षणिक कार्यक्रम ,शासन की कल्याणकारी योजनाएं , मौसम आदि की जानकारी देते हुए लोगों को उपयोगी संदेश देता है।
सबके बीच अपनी लोकप्रियता को लगातार बढ़ा रहा है।
रेडियो के महत्व को बताने~ बढ़ाने के लिए संयुक्त राष्ट्र के शैक्षणिक , वैज्ञानिक ,सांस्कृतिक संगठन यूनेस्को ने प्रति वर्ष 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस मनाए जाने की घोषणा की। यूनेस्को की घोषणा के अनुसार हर साल अलग-अलग थीम पर विश्व रेडियो दिवस मनाया जाता है ।
इस वर्ष 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस 2022 के अवसर पर यूनेस्को ने आह्वान किया है कि यह दिवस तीन उप विषयों के माध्यम से मनाया जाए ।
इन तीन उप विषयों के माध्यम से यूनेस्को ने अपील की है कि रेडियो पत्रकारिता में विश्वास बढ़े, इसके लिए स्वतंत्र और उच्च गुणवत्ता वाली सामग्री तैयार की जाए ।
रेडियो के लिए कार्यक्रम तैयार करते हुए सुनने वालों की पसंद का ख्याल रखें।
रेडियो स्टेशनों के बीच श्रोताओं के लिए बेहतर कार्यक्रम तैयार करने की प्रतिस्पर्धा हो तो इससे रेडियो की गुणवत्ता, विश्वसनीयता बढ़ेगी ।
यदि भारत के संदर्भ में बात करें तो रेडियो ने आजादी के आंदोलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है ।
आजादी आंदोलन के महानायक सुभाष चंद्र बोस ने विदेश से रेडियो को माध्यम बनाकर भारत की जनता से संवाद किया।
भारत में आजादी के बाद रेडियो ही ऐसा माध्यम था जिससे देशभर में कोई भी संदेश आसानी से पहुंचाया जाता था।
लॉर्ड माउंटबेटन ,जवाहरलाल नेहरू , मोहम्मद अली जिन्ना, सरदार पटेल ने भी रेडियो के माध्यम से जनता तक अपना संदेश पहुंचाया ।
संसद के केंद्रीय कक्ष से 14-15 अगस्त 1947 की मध्य रात्रि को भारत की स्वतंत्रता प्रदान करने संबंधी समारोह का सीधा प्रसारण रेडियो के स्वर्णिम इतिहास में दर्ज है ।
भारत में रेडियो के इतिहास में एक जनवरी 1936 का दिन महत्वपूर्ण है , जब रेडियो का दिल्ली से प्रसारण प्रारंभ हुआ। इसी माह की 19 तारीख को रेडियो पर पहला समाचार बुलेटिन प्रसारित हुआ ।
रेडियो को प्रभावी पहचान आकाशवाणी के माध्यम से मिली।
शुरू में इसे इंडियन ब्रॉडकास्टिंग सर्विस कहा गया ।
यह नाम 8 जून को बदलकर ऑल इंडिया रेडियो कर दिया गया।
इसके बाद 3 अक्टूबर 1957 को इसे फिर बदला गया और आकाशवाणी कहा जाने लगा ।
वर्ष 1947 में आकाशवाणी के छह रेडियो स्टेशन थे जिनकी संख्या अब 470 से अधिक हो गई है ।
भारत में 99% से अधिक जनता को रेडियो कवर करता है ।
अब तो निजी एफएम चैनल भी देश के विभिन्न राज्यों और महानगरों में लगातार बढ़ते जा रहे हैं।
इनकी संख्या 500 से अधिक है।
इसी प्रकार सामुदायिक रेडियो भी लगातार बढ़ते जा रहे हैं।
रेडियो सामाजिक बदलाव और विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका को लगातार निभा रहा है।
यह लोगों की जागरूकता , जानकारी बढ़ाने का काम बिना रुके , बिना थके लगातार कर रहा है ।
रेडियो के प्रति लोगों का लोगों सदैव बना रहेगा बढ़ता रहेगा ऐसा विश्वास है।
( लेखक आकाशवाणी से संबद्ध हैं , संपर्क 9424466269 )
