लेखक ✍️ देवेंद्र कुमार साहू
(संपादक )
दैनिक माधव एक्सप्रेस
भारत एक कृषि-प्रधान देश है, जहां आज भी करोड़ों लोगों की आजीविका खेती पर निर्भर है। देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले किसान ही हमारे अन्नदाता हैं। लेकिन विडंबना यह है कि तकनीक के इस दौर में भी जब किसानों को सबसे ज्यादा सुविधा और सहूलियत की आवश्यकता है, तब वे अक्सर व्यवस्था की खामियों का सामना करते नजर आते हैं।
आज हम देखते हैं कि एक साथ 50 करोड़ लोग मोबाइल पर लाइव क्रिकेट का आनंद आसानी से ले सकते हैं। बड़े-बड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म बिना किसी रुकावट के इतने विशाल ट्रैफिक को संभाल लेते हैं। यह तकनीकी क्षमता और प्रगति का प्रमाण है। लेकिन दूसरी ओर, जब केवल 50 हजार किसान स्लॉट बुकिंग, तोल पर्ची या उर्वरक के ई-टोकन के लिए ऑनलाइन सिस्टम का उपयोग करते हैं, तो सर्वर डाउन हो जाता है।
यह स्थिति केवल तकनीकी कमी का मामला नहीं है, बल्कि यह हमारी प्राथमिकताओं पर भी सवाल खड़ा करती है। क्या हम सच में उस क्षेत्र को उतनी गंभीरता दे रहे हैं, जो हमारी मूलभूत जरूरत—अन्न—से जुड़ा है? अगर तकनीक का सही उपयोग हो, तो किसानों के लिए प्रक्रियाएं आसान, पारदर्शी और समयबद्ध बनाई जा सकती हैं। लेकिन वर्तमान हालात बताते हैं कि कहीं न कहीं योजना और क्रियान्वयन में बड़ी खाई है।
किसानों को बार-बार सर्वर की समस्या, लंबी प्रतीक्षा और अनिश्चितता का सामना करना पड़ता है। इससे न केवल उनका समय नष्ट होता है, बल्कि उनकी आर्थिक स्थिति पर भी असर पड़ता है। यह जरूरी है कि सरकार और संबंधित एजेंसियां कृषि से जुड़े डिजिटल प्लेटफॉर्म को मजबूत करें, ताकि किसान बिना किसी परेशानी के अपनी जरूरतें पूरी कर सकें।
तकनीक का असली उद्देश्य आम लोगों, खासकर किसानों के जीवन को सरल बनाना है। यदि हम इसमें सफल नहीं हो पा रहे हैं, तो यह हमारे लिए आत्ममंथन का विषय है। देश की प्रगति तभी सार्थक होगी, जब उसका लाभ हर वर्ग तक समान रूप से पहुंचे—विशेषकर उन तक, जो हमें भोजन उपलब्ध कराते हैं।
जय हिंद, जय भारत, जय किसान
