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डॉक्टर महेन्द्र यादव की पाती थोड़ी जज्बाती
आज का दौर दिखावे का दौर है। रोशनी, धुआँ, बड़े-बड़े एलईडी स्क्रीन, हजारों की भीड़ और कान फाड़ देने वाला म्यूजिक… सब कुछ इतना भव्य कि सच्चाई कहीं पीछे छूट जाती है। दर्शक ताली बजाते हैं, झूमते हैं, वीडियो बनाते हैं — और उन्हें लगता है कि वे एक “लाइव” परफॉर्मेंस का हिस्सा हैं। लेकिन क्या वाकई सब कुछ लाइव होता है?
सच्चाई थोड़ी कड़वी है।
आजकल बड़े-बड़े स्टेज शो और कॉन्सर्ट्स में ज्यादातर गायक लिप्सिंग का सहारा लेते हैं। पहले से रिकॉर्ड किए गए गाने, तैयार मैशअप, और मंच पर बस माइक लेकर थोड़ी-बहुत बातचीत — ताकि दर्शकों को भ्रम बना रहे कि गाना यहीं, इसी क्षण जन्म ले रहा है। भीड़ इतनी होती है, शोर इतना होता है कि किसी को फर्क ही नहीं पड़ता कि आवाज़ स्पीकर से आ रही है या कलाकार के गले से।
इतना ही नहीं, कई बार तो इंस्ट्रूमेंट बजाने वाले भी सिर्फ “एक्टिंग” करते हैं। गिटार के तार छूते हैं, ड्रम पर हाथ मारते हैं — लेकिन असल संगीत कहीं और से बज रहा होता है। यह एक तरह का सजा-संवरा भ्रम है, जिसे दर्शक सच मान लेते हैं… और इसी भ्रम की कीमत करोड़ों में वसूली जाती है।
अब सवाल यह है कि नुकसान किसका हो रहा है?
नुकसान उस सच्चे कलाकार का हो रहा है, जो हर सुर को अपने गले से निकालता है। जो स्टेज पर पसीना बहाता है, गलती होने का जोखिम उठाता है, लेकिन दर्शकों को असली संगीत देने की कोशिश करता है। ऐसे कलाकारों से अक्सर कहा जाता है — “थोड़ा कम ले लो…”
यानी जो जितना सच्चा है, उसकी कीमत उतनी कम।
यह विडंबना ही है कि नकली प्रदर्शन महंगा बिक रहा है, और असली कला सस्ते में आंकी जा रही है।
लेकिन तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। बदलाव की चाबी आज भी दर्शकों के हाथ में है। जिस दिन श्रोता यह तय कर लेंगे कि उन्हें सिर्फ लाइव, असली और ईमानदार परफॉर्मेंस ही सुननी है — उस दिन से यह दिखावे का बाजार अपने आप बदल जाएगा।
जो आज लिप्सिंग कर रहे हैं, वे भी मजबूर होंगे अपने सुरों को फिर से साधने के लिए।
क्योंकि आखिर में, संगीत सिर्फ सुनने की चीज़ नहीं है…
महसूस करने की चीज़ है।
और सच्चाई की आवाज़, चाहे कितनी भी धीमी क्यों न हो —
एक दिन सबसे ऊँची गूंज बनती है।
