(बरगी डैम हादसे की एक तस्वीर से उपजी संवेदना — मुंशी प्रेमचंद की शैली में)
जबलपुर के बरगी डैम की लहरें कल कुछ अलग थीं। उनमें केवल पानी नहीं, बल्कि करुणा, वेदना और एक असहनीय सन्नाटा बह रहा था।
क्रूज़ हादसे की खबर तो मन को विचलित कर ही रही थी, पर जब उस एक वायरल तस्वीर पर नजर पड़ी, तो सचमुच आंखों की कोर गीली हो गई—और शब्द जैसे स्वयं जन्म लेने लगे।
वह तस्वीर कोई साधारण दृश्य नहीं थी—
एक माँ, जिसने मृत्यु को भी मात देने की कोशिश की…
और एक बच्चा, जो उसकी छाती से चिपका हुआ था, मानो संसार की हर विपत्ति से सुरक्षित हो।
जीवन और मृत्यु के उस अंतिम क्षण में भी, माँ ने अपने कर्तव्य को नहीं छोड़ा।
वह स्वयं डूब गई, पर अपने बच्चे को सीने से लगाए रही—जैसे कह रही हो,
“डर मत बेटा, मैं हूँ न…”
यह दृश्य देखकर मन अनायास ही उस युग में चला जाता है, जहाँ मुंशी प्रेमचंद अपने शब्दों से ऐसी ही करुणा को जीवित कर देते थे।
अगर वे आज होते, तो शायद लिखते—
“माँ का हृदय वह दीपक है, जो आँधियों में भी अपने बच्चे के लिए जलता रहता है, चाहे स्वयं बुझ क्यों न जाए।”
बरगी की लहरों ने उस माँ के शरीर को भले ही शांत कर दिया हो, पर उसकी ममता आज भी जीवित है—उस तस्वीर में, उस दृश्य में, और हर उस आंख में, जो उसे देखकर नम हो गई।
यह हादसा केवल एक दुर्घटना नहीं है।
यह हमारी संवेदनहीनता, हमारी लापरवाही और हमारी अधूरी व्यवस्थाओं की कहानी भी है।
जहाँ एक ओर लोग जीवन का आनंद लेने निकले थे, वहीं दूसरी ओर नियति ने उन्हें ऐसी पीड़ा दे दी, जिसकी कल्पना भी कठिन है।
पर इस सबके बीच, वह माँ हमें एक गहरी सीख दे गई—
कि प्रेम, त्याग और ममता की कोई सीमा नहीं होती।
माँ का हृदय अंतिम सांस तक अपने बच्चे के लिए धड़कता है, चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी क्यों न हों।
आज जब हम उस तस्वीर को देखते हैं, तो केवल दुःख ही नहीं होता—
एक प्रश्न भी उठता है—
क्या हम इस पीड़ा से कुछ सीखेंगे?
या फिर यह भी अन्य घटनाओं की तरह समय के साथ स्मृतियों में खो जाएगी?
नर्मदा आज भी बह रही है, पर उसकी हर लहर मानो यही कह रही है—
“माँ का प्रेम अमर है, पर मनुष्य की भूलें क्षणिक नहीं होतीं—वे इतिहास बन जाती हैं।”
लेखक:
*डॉ. जयेन्द्र कुमार जैन ‘निप्पू’, चन्देरी*राष्ट्रीय गौरव भ्रमणभाष 9407222244
