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(संजय अग्रवाल)
प्रिय किसान भाइयों, पर्यावरण प्रेमियों, हिंदू समाज के साथियों और मध्य प्रदेश के सभी नागरिकों,
आज मध्य प्रदेश के खेतों में गेहूं की कटाई के बाद एक भयावह दृश्य देखा जा रहा है। खेत-खेत में आग की लपटें उठ रही हैं, धुआं आसमान को काला कर रहा है। हाल ही में दैनिक भास्कर ने हेलीकॉप्टर से 10 हजार फीट की ऊंचाई पर भोपाल, रायसेन, विदिशा, अशोकनगर, सागर और निवाड़ी का सर्वेक्षण किया। उसमें कई जगहों पर खेत जलते हुए और काले धुएं के गुबार दिखाई दिए। CREAMS और ICAR के आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2026 के पहले 21 दिनों में मध्य प्रदेश में 20,164 पराली जलाने के मामले दर्ज हुए हैं – जो देश के कुल मामलों का लगभग 69% है। भोपाल, विदिशा, उज्जैन, रायसेन और नर्मदापुरम जैसे जिलों में यह समस्या हर साल बढ़ रही है। मध्य प्रदेश अब पराली जलाने में उत्तर प्रदेश और हरियाणा से भी आगे निकल चुका है।
सरकार नरवाई पर रोक लगाने की कोशिश कर रही है, लेकिन यह प्रयास केवल कागजों तक सीमित नजर आते हैं। हर साल 20 हजार से अधिक मामले सामने आते हैं, फिर भी स्थिति नहीं सुधर रही। यह सिर्फ एक कृषि समस्या नहीं है – यह हमारी मातृभूमि, वातावरण, मिट्टी और आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य का संकट है।
पराली जलाने के घातक पर्यावरणीय और कृषि नुकसान
1. वातावरण में गर्मी का बढ़ना और जलवायु परिवर्तन**
पराली जलाने से निकलने वाला काला धुआं (ब्लैक कार्बन) और ग्रीनहाउस गैसें (CO₂, CH₄, N₂O) वातावरण को गर्म करते हैं। यह स्थानीय तापमान बढ़ाता है और वैश्विक उष्णता में योगदान देता है। हमारी प्राचीन हिंदू परंपरा में पृथ्वी को माता मानकर उसकी रक्षा करने का संदेश है, लेकिन आज हम उसी मातृभूमि को आग के हवाले कर रहे हैं।
2. **वायु प्रदूषण का बढ़ना**
पराली जलाने से PM2.5, PM10, कार्बन मोनोऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड जैसी हानिकारक गैसें निकलती हैं। यह धुआं न केवल स्थानीय क्षेत्रों बल्कि पड़ोसी राज्यों तक फैलता है। सांस की बीमारियां, आंखों में जलन, हृदय रोग और बच्चों-बुजुर्गों में सांस लेने की समस्या बढ़ रही है।
3. **ओजोन परत और वायु गुणवत्ता पर प्रभाव**
पराली से निकलने वाले कार्बन मोनोऑक्साइड और अन्य प्रदूषक वायुमंडल में ट्रोपोस्फेरिक ओजोन को बढ़ाते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए बेहद हानिकारक है। इससे ओजोन परत का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता है।
4. **मिट्टी के कीटाणुओं (सूक्ष्मजीवों) का विनाश**
जलने से मिट्टी का तापमान 33.8°C से 42.2°C तक बढ़ जाता है। इससे मिट्टी में रहने वाले लाभकारी बैक्टीरिया, फंगी, केंचुए और अन्य सूक्ष्मजीव मर जाते हैं। मिट्टी की उर्वरता घटती है, पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं। किसान को बाद में ज्यादा रासायनिक खादों का सहारा लेना पड़ता है।
5. **अन्य नुकसान**
– जैव विविधता पर असर
– आर्थिक नुकसान: पराली को खाद, चारा या बायोगैस के रूप में उपयोग करके अतिरिक्त आय अर्जित की जा सकती है।
जन-जागरण क्यों जरूरी है?
किसान भाई पराली जलाते हैं क्योंकि समय की कमी, मशीनों की अनुपलब्धता या पुरानी आदत के कारण। लेकिन यह समस्या अब व्यक्तिगत नहीं रही – यह सामूहिक संकट है। **World Hindu Federation** मध्य प्रदेश की ओर से हम एक बड़े जन-जागरण अभियान की शुरुआत कर रहे हैं। हमारा उद्देश्य है कि हर किसान को इन नुकसानों की जानकारी दी जाए और उन्हें वैकल्पिक समाधान उपलब्ध कराए जाएं।
**व्यावहारिक समाधान**:
– **हैपी सीडर** और अन्य मशीनें: पराली को खेत में ही mulch के रूप में बिछाकर अगली फसल बोना।
– **पूसा बायो-डीकंपोजर**: 15-20 दिनों में पराली को खाद में बदल देता है।
– पराली को चारे, बायोगैस प्लांट या पेपर इंडस्ट्री में उपयोग करना।
– सरकारी योजनाओं (सब्सिडी पर मशीनें, प्रोत्साहन राशि) का लाभ उठाना।
हम **World Hindu Federation** के माध्यम से गांव-गांव जाकर कार्यशालाएं आयोजित करेंगे, जागरूकता रैलियां निकालेंगे और हिंदू संस्कृति के पर्यावरण संरक्षण के सिद्धांतों से जोड़कर किसानों को प्रेरित करेंगे।
हमारा कर्तव्य
हिंदू धर्म में प्रकृति पूजा का महत्व है। नदियां, पर्वत, वन और खेत – सब हमारे देवता हैं। पराली जलाना प्रकृति के साथ छेड़छाड़ है।
मध्य प्रदेश के किसानों से मेरा आह्वान है – एक बार सोचिए, एक कदम उठाइए। पराली न जलाएं, मिट्टी को बचाएं, वातावरण को शुद्ध रखें।
आइए, हम सब मिलकर “पराली जलाओ नहीं, मिट्टी बचाओ” का संकल्प लें।
(लेखक वर्ल्ड हिंदू फेडरेशन मध्यप्रदेश के अध्यक्ष हैं।)
