फ़िल्म समीक्षक : डॉ. महेन्द्र यादव
भारतीय सिनेमा के स्वर्णिम इतिहास में वर्ष 1953 में आई यह फिल्म एक मील का पत्थर मानी जाती है। यथार्थवाद की धारा को मजबूती देने वाली इस फिल्म ने यह साबित किया कि सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज की सच्चाई को आवाज़ देने का माध्यम भी है। लगभग 2 घंटे की यह फिल्म दर्शक को एक किसान के संघर्ष, उम्मीद और आत्मसम्मान की ऐसी कहानी सुनाती है कि अंत तक दिल भीग जाता है और सोच बदलने लगती है।
इस कालजयी फिल्म का निर्देशन और निर्माण महान फिल्मकार बिमल रॉय ने किया। उनके निर्देशन की संवेदनशीलता इस फिल्म को साधारण कहानी से असाधारण अनुभव बना देती है।
प्रमुख कलाकार
मुख्य भूमिका (शंभू महतो): बलराज साहनी
नायिका (पार्वती): निरूपा रॉय
चाइल्ड आर्टिस्ट (कन्हैया): रतन कुमार
सह कलाकार
मुराद
नाज़िर हुसैन
मीनू मुमताज़
फिल्म से जुड़े महत्वपूर्ण रचनाकार
निर्माता (Producer): बिमल रॉय
निर्देशक (Director): बिमल रॉय
सहायक निर्देशक (Assistant Directors): हृषिकेश मुखर्जी, असित सेन
संपादक (Editor): हृषिकेश मुखर्जी
संगीतकार (Music Director): सलिल चौधरी
गीतकार (Lyricist): शैलेन्द्र
प्रमुख गायक–गायिका
मन्ना डे
लता मंगेशकर
मोहम्मद रफ़ी
सलिल चौधरी का संगीत और शैलेन्द्र के गीत फिल्म की आत्मा बन जाते हैं। गीतों में मिट्टी की खुशबू है, दर्द है और उम्मीद भी।
कहानी की आत्मा
दो बीघा ज़मीन एक गरीब किसान शंभू महतो की कहानी है, जिसकी छोटी सी जमीन ही उसकी पूरी दुनिया है। लेकिन कर्ज़ और परिस्थितियाँ उसे शहर की कठोर सच्चाई से लड़ने पर मजबूर कर देती हैं। रिक्शा खींचते हुए उसका संघर्ष सिर्फ पेट भरने का नहीं, बल्कि अपने आत्मसम्मान और अपनी जमीन बचाने का भी है।
फिल्म का हर दृश्य इतना सच्चा लगता है कि दर्शक खुद उस यात्रा का हिस्सा बन जाता है।
पुरस्कार और सम्मान
इस फिल्म ने देश और विदेश में खूब सराहना पाई।
कान्स फिल्म फेस्टिवल (1954) में अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार (International Prize) से सम्मानित।
फ़िल्मफेयर अवॉर्ड (1954) में सर्वश्रेष्ठ फिल्म और सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का सम्मान।
भारतीय यथार्थवादी सिनेमा की दिशा बदलने वाली फिल्मों में इसका नाम आज भी शीर्ष पर लिया जाता है।
आज भी क्यों देखी जानी चाहिए
आज जब सिनेमा बड़े बजट और तकनीक के दौर में है, तब दो बीघा ज़मीन हमें याद दिलाती है कि सच्ची कहानी और सच्चा अभिनय ही असली ताकत है। बलराज साहनी का अभिनय इतना जीवंत है कि दर्शक कई बार भूल जाता है कि वह फिल्म देख रहा है।
अच्छी बात यह है कि यह कालजयी फिल्म आज भी YouTube और Prime Video पर देखी जा सकती है।
अंत में — एक प्रेरणा
अगर आप सचमुच सिनेमा को समझना चाहते हैं, अगर आप यह जानना चाहते हैं कि एक साधारण इंसान का संघर्ष कितनी बड़ी कहानी बन सकता है — तो दो बीघा ज़मीन जरूर देखिए।
यह फिल्म सिर्फ दिल को नहीं छूती, बल्कि इंसान के भीतर उम्मीद और हिम्मत भी जगा देती है।
एक शाम इस फिल्म के नाम कीजिए… शायद यह आपको जिंदगी को थोड़ा और गहराई से देखने की प्रेरणा दे जाए।
