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डॉक्टर महेन्द्र यादव की पाती थोड़ी जज्बाती
हमारे देश में आदमी की ऊँचाई सेंटीमीटर से नहीं, कभी-कभी उसके व्यवहार से नापी जाती है। वरना मंच पर खड़े दो कलाकारों की लंबाई में शायद कोई खास अंतर न हो, लेकिन दिल की ऊँचाई का फीता अलग होता है।
किस्सा बड़ा दिलचस्प है।
एक तरफ़ वो शख्स था जो बड़े-बड़े आयोजनों में लाखों की फीस लेता था। नाम भी बड़ा, काम भी बड़ा, और लोकप्रियता भी आसमान छूती हुई। लेकिन जब ठहाका सम्मेलन का नाम आया तो उसने हिसाब-किताब की कैलकुलेटर जेब में रख दी और कहा।”सम्मान सबसे बड़ा होता है।” फिर आया, पूरे मन से आया, और नब्बे मिनट तक लोगों को हँसाकर गया।
दूसरी तरफ़ एक ऐसे कलाकार की कहानी है जो दूसरे मंचों पर कभी तीस में, कभी पैंतीस में, कभी इक्कीस में भी कार्यक्रम कर लेता है। लेकिन जैसे ही ठहाका सम्मेलन का नाम सुना, अचानक उसके भाव ऐसे बढ़ गए जैसे शेयर बाजार में किसी कंपनी का सर्किट लग गया हो। लगा मानो कलाकार नहीं, प्याज़ की बोरी बिक रही हो।
तब समझ में आया कि बड़ा आदमी वह नहीं होता जिसकी फीस बड़ी हो। बड़ा आदमी वह होता है जो अपने कद को रकम से नहीं, रिश्तों से मापता है।
छोटा आदमी अक्सर अपनी कीमत बताता फिरता है। बड़ा आदमी अपनी कीमत बताए बिना पहचान लिया जाता है।
छोटा आदमी हर बातचीत में रेट कार्ड निकाल लेता है। बड़ा आदमी कभी-कभी रेट कार्ड से ऊपर उठकर सम्मान देख लेता है।
और सबसे मज़ेदार बात यह है कि छोटे आदमी को हमेशा डर रहता है कि कहीं लोग उसे छोटा न समझ लें, जबकि बड़े आदमी को कुछ साबित करने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।
इसलिए अब लगता है कि कलाकार की महानता उसके पोस्टर के आकार से नहीं, बल्कि उस क्षण से तय होती है जब वह पैसों और सम्मान में से किसी एक को चुनता है।
बाक़ी दुनिया तो हँसती ही है, व्यंग्यकार भी मुस्कुरा कर इतना ही कहता है
“कुछ लोग मंच पर चुटकुले सुनाकर बड़े बनते हैं,
और कुछ लोग अपने व्यवहार से।”
