*31 मई 2026 जन्म-जयंती विशेष-*

लेखक नरेंद्र सिंह ठाकुर
मालवा प्रांत इंदौर की अद्वितीय शासिका देवी अहिल्याबाई होलकर एक सुयोग्य,जनहितैषी,कल्याणकारी,अद्भुत सैन्य शक्ति सम्पन्न,सशक्त एवं महान नेतृत्व कर्ता के साथ ही कुशल शासिका थी।उनके सुशासन, कुशल प्रशासन, न्याय प्रियता,परोपकार,धर्म जागरण व संरक्षण, सांस्कृतिक और धार्मिक समरसता,सामाजिक कल्याण के कार्य उन्हें राजमाता से लोकमाता के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। प्रातः स्मरणीय अहिल्याबाई होल्कर की सरलता, सहजता,कर्त्तव्य परायणता आदि गुण उन्हें भारतीय इतिहास की एक महान और सम्मानित शासिका का स्थान प्रदान करते हैं।उनका योगदान न केवल मराठा साम्राज्य के लिए अपितु मध्य प्रदेश के साथ ही संपूर्ण भारत के इतिहास में भी अत्यधिक महत्वपूर्ण रहा है।
देवी अहिल्याबाई होलकर के राजत्व का सिद्धांत *प्रजावत्सलता और जन कल्याण* पर आधारित था।उन्होंने सत्ता को सेवा और धर्म रक्षा का माध्यम माना। वे शासक को राज्य का मालिक नहीं बल्कि जनता का सेवक मानती थी। वे राज्य की समृद्धि और प्रजा की सुरक्षा को ही अपना सर्वोच्च कर्तव्य मानती थी।
देवी अहिल्याबाई होल्कर का जन्म 1725 ई.में महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के छोटे से गांव चोंडी में मानको जी शिंदे के यहां हुआ था। उनका विवाह मालवा इंदौर क्षेत्र के सूबेदार मल्हार राव होलकर के सुपुत्र खांडेराव होलकर के साथ 1733 ई.में संपन्न हुआ था। खांडेराव अल्पायु में ही 1754ई. में कुम्हेर की लड़ाई में मृत्यु को प्राप्त हो गए! अहिल्या बाई अपने पति खांडेराव की असामयिक मृत्यु से इतनी दुःखी हुई कि उन्होंने सती होने का निश्चय किया। लेकिन दूरदर्शी ससुर मल्हार राव होल्कर ने उन्हें ऐसा कठोर कदम उठाने से रोक लिया।क्रूर काल के प्रभाव से 1766 ई.में श्वसुर मल्हारराव होलकर भी काल कवलित हो गए! अगले वर्ष अहिल्याबाई के सुपुत्र मालेराव का भी गंभीर बीमारी के चलते असामयिक निधन हो गया।अहिल्याबाई पर तो मानों दुःखों का पहाड़ ही टूट पड़ा। अहिल्याबाई ने अनुपम धैर्य और साहस से काम लिया और लोक कल्याण को सर्वोपरि मानते हुए उन्होंने पेशवा से मालवा प्रांत का शासन संभालने की अनुमति माँगी। कुछ लोगों के विरोध के बावजूद भी उन्हें शासन संभालने के अनुमति प्राप्त हो गई,उसके पीछे का कारण उन्हें सेना का समर्थन प्राप्त था। सेना को अहिल्याबाई की सैन्य और प्रशासनिक क्षमता पर अटूट विश्वास था।
11 दिसम्बर 1767 ई.को देवी अहिल्या बाई होलकर ने शासन सत्ता की बागडोर संभाल कर इंदौर की शासिका बनने का गौरव प्राप्त किया।उन्होंने अपने राजत्व के सिद्धांत तय कर इंदौर की शासिका के रूप में शासन किया ।
*अहिल्याबाई के राजत्व (शासन) के सिद्धांत-*
*जनकेन्द्रित शासन-प्रजा हित सर्वोपरि-*
देवी अहिल्याबाई होल्कर का शासन प्रजावत्सलता और जनकल्याण पर आधारित था। उनका मानना था कि शासक मालिक नहीं अपितु जनता का सेवक होता है। उनकी यह दृढ़ मान्यता थी कि सत्ता- सेवा एवं धर्म का माध्यम है ।प्रजा की सेवा ही सर्वोत्तम धर्म है।राज्य की समृद्धि और जनता की सुरक्षा एक शासक का सर्वोच्च कर्त्तव्य हैं ।उन्होंने राज्य को एक परिवार की तरह माना और प्रजा के दुःखों को दूर करना अपना मुख्य कर्तव्य समझा।अपनी प्रजा को वे पुत्रवत स्नेह करती थीं। अनाथों, विधवाओं और बेसहारा लोगों की उन्होंने बहुत सहायता की।
*धर्म और न्याय पर आधारित शासन प्रबंधन-*
अहिल्याबाई ने अपने राजत्व के तय सिद्धान्तों में धर्म का अर्थ केवल पूजा पाठ करने से ही नहीं अपितु कर्तव्य और नैतिकता को आत्मसात करने से माना है। उनके दरबार में बिना किसी भेद-भाव के निष्पक्ष न्याय दिया जाता था। उनकी न्याय प्रियता के सैकड़ो किस्से जन मानस में प्रचलित हैं।
अहिल्याबाई की न्याय प्रियता का एक किस्सा आज भी इंदौर के लोगों की जबान पर है।हुवा यूं कि एक बार प्रातःकाल युवराज मालेराव हवाखोरी के लिए निकले।रास्ते में एक गाय ने अपने बछड़े को जन्म दिया था।गाय अपने नवजात बछड़े को चाट ही रही थी कि सत्ता मद में चूर मालेराव ने अंधाधुन्ध गति से अपना रथ चला कर नवजात बछड़े को रौंध डाला!कहते हैं कि अहिल्याबाई ने अपनी प्रजा को निष्पक्ष न्याय तत्काल मिल सके इस लिए अपने महल के बाहर एक घंटा लगा रखा था,जिसमें एक जंजीर बंधी रहती थी।पीड़ित गाय द्वारा जंजीर से घंटा बजा कर न्याय की गुहार लगाई!अहिल्या बाई ने जब उसके मालिक को दरबार में उपस्थित करवाया तो उसने गाय के साथ घटित घटना का वृतांत निवेदित कर दिया।अहिल्या बाई ने अपने पुत्र को भी ठीक उसी तरह दंड देने का निश्चय किया और पुत्र मालेराव के हाथ-पैर बांध कर ठीक उसी जगह रख दिया जहां पर गाय का बछड़ा मारा गया था।अहिल्याबाई ने अपने सारथी को रथ चलाने का हुक्म दिया।सारथि ने युवराज के ऊपर से रथ चलाने में असमर्थता जताई!अतः न्यायप्रिय देवी अहिल्याबाई स्वयं रथ पर चढ़कर रथ चलाने को उद्यत हुई।कहते हैं तभी वह गौमाता अहिल्याबाई के रथ के सामने आकर अड़ गई,और मानो मूक याचना कर कह रही हो कि मैंने अपनी संतान का बिछोह सहन किया है।मैं जानती हूं संतान का दर्द क्या होता है,और वह रथ के सामने से नहीं हटी! जहाँ गाय रथ के सामने अड़ी थी वह स्थान आज इंदौर का “आड़ा बाज़ार” के नाम से जाना जाता है।
सनातन धर्म को बढ़ावा देने के लिए अहिल्याबाई ने संपूर्ण भारत में अनेकों मंदिरों का निर्माण एवं जीर्णोद्धार करवाया।धर्म के प्रचार- प्रसार हेतु अपना योगदान दिया तथा भारतीय संस्कृति और परंपरा को बढ़ावा देने की ऐतिहासिक पहल की।
*सामाजिक समरसता और समभाव को बढ़ावा-*
राजमाता अहिल्याबाई के राजत्व के सिद्धांत में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत सामाजिक समरसता और समभाव का है।उनका मानना था कि जाति, वर्ग या वर्ण के आधार पर भेदभाव करना अत्यंत ही निष्कृष्ट कार्य है। वह व्यक्ति की योग्यता को महत्वपूर्ण मानती थीं।उन्होंने वंचित, शोषित एवं पिछड़े समुदाय के उत्थान हेतु सदैव ध्यान दिया।भील समुदाय के उत्थान हेतु उन्होंने अथक प्रयास किया और उन्हें मुख्य धारा में जोड़ा। उनकी राज तांत्रिक शासन व्यवस्था में प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था के दर्शन होते हैं।
*आर्थिक समृद्धि हेतु उद्योग -व्यापार एवम कृषि को प्रोत्साहन-*
अहिल्याबाई का मानना था कि कोई भी राज्य उन्नति के शिखर पर तब तक नहीं पहुंच सकता जब तक कि वह आर्थिक रूप से समृद्ध ना हो। इसके लिए कृषि और व्यापार की समृद्धि आवश्यक है। उन्होंने कृषि और व्यापार को बहुत बढ़ावा दिया। किसानों को आत्मनिर्भर बनाने हेतु उन्हें हर संभव सुविधा उपलब्ध करवाई गई। किसानों के कृषि हेतु भूमि आवंटन में सहायता की। वे आपदा के समय कृषि पर लगने वाले कर (लगान)को भी माफ़ कर दिया करती थी।
उद्योग और व्यापार को प्रोत्साहित करने हेतु आपने महेश्वर मध्य प्रदेश को वस्त्र उत्पादन का प्रमुख केंद्र बनाया और महेश्वरी साड़ियों की बुनाई को प्रोत्साहित किया। विशेष कर महिला बुनकरों को सहायता प्रदान कर स्वरोजगार को बढ़ावा दिया। इससे राज्य की आर्थिक समृद्धि को बल मिला।
*सांस्कृतिक एवम सामाजिक केंद्रों का निर्माण-*
अपने शासन के सुचारू संचालन हेतु अहिल्याबाई ने अनेक सांस्कृतिक एवम सामाजिक केंद्रों का निर्माण करवाया।देश भर में प्रमुख तीर्थ स्थल काशी, सोमनाथ,अयोध्या, बद्रीनाथ,रामेश्वरम,हरिद्वार, ओंकारेश्वर, महेश्वर, मंडलेश्वर में अनेको मंदिरों का निर्माण एवं जीर्णोद्धार करवाया।तीर्थ यात्रियों के लिए सैकड़ो धर्मशालाओं का निर्माण करवाया ,जो सांस्कृतिक और सामाजिक केंद्र के रूप में जाने जाते हैं।
महिलाओं और समाज के कमजोर वर्गों के कल्याण के लिए कई कार्य किये। उन्होंने मंदिरों के निर्माण, पुनर्निर्माण के अतिरिक्त जल संरक्षण एवम संवर्धन के लिए कुँए और बावड़ी का निर्माण भी करवाया।कोई भूखा न रहे इसके लिए अन्न क्षेत्र खोलें। प्यासों के लिए पेयजल हेतु प्याऊ का निर्माण करवाया। उन्होंने नदियों के तट पर अनेकों घाटों का निर्माण भी संपूर्ण भारत के प्रमुख तीर्थ स्थानों पर करवा कर सामाजिक समरसता और समभाव का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया।
*महिला सशक्तिकरण एवं सैन्य शक्ति-*
देवी अहिल्याबाई ने महिलाओं के सशक्तिकरण हेतु कई कार्य किये।उन्होंने महिलाओं की सेना तैयार की और उन्हें प्रशिक्षित किया। वह स्वयं केवल एक शासिका ही नहीं बल्की एक सशक्त सैन्य योद्धा भी थी ।उन्होंने कई युद्ध में अपनी सेना का सफलतापूर्वक नेतृत्व किया। उनका युद्ध कौशल और दृष्टिकोण अद्वितीय था। उन्होंने अपनी कुशल रणनीति के तहत बाहरी आक्रमणों का तत्काल मुकाबला किया और अपने राज्य को सुरक्षित रखा।
लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर का शासन काल मध्य प्रदेश के इतिहास में स्वर्णिम युग माना जाता है शिव भक्त अहिल्याबाई इंदौर मालवा की शासिका होने के साथ ही निमाड़ क्षेत्र के महेश्वर को अपनी राजधानी बनाया,इसके पीछे मां नर्मदा का पावन तट और समीप ही भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग स्वरूप का सानिध्य उन्हें सदैव प्राप्त हो होता रहे ऐसा उनका मानना था। वे अपने प्रत्येक शासकीय-पत्र (आदेश) का आरंभ “भगवान शिव की आज्ञा से” लिख कर किया करती थीं।
ऐसी महान,असाधारण, अद्वितीय, अनुपम,अद्भुत कार्य क्षमता वाली मालवा प्रान्त की सुयोग्य शासिका अहिल्या बाई होलकर के राजत्व के सिद्धांत उन्हें एक कुशल शासिका की पहली पंक्ति में खड़ा करते हैं।
अहिल्याबाई का निधन भाद्र पक्ष की चतुर्दशी तदानुसार 13 अगस्त 1795 ई. को हुआ था। उनके कार्यों ,को हमेशा याद किया जाएगा ।उन्होंने इंदौर ही नहीं बल्कि पूरे भारत के लिए एक मजबूत महिला नेतृत्वकर्ता का उदाहरण प्रस्तुत किया है।लोकमाता अहिल्याबाई होलकर की 301 वी जन्म जयंती(31 मई 2026)के अवसर पर उनके श्री चरणों में सादर शत-शत नमन!वंदन!!
