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फिल्म समीक्षक:
डॉ. महेन्द्र यादव
अगर 30 साल बाद किसी कल्ट फिल्म का सीक्वेल सिर्फ इसलिए बनाया जाए क्योंकि उसी हीरो की एक और फिल्म ने 500 करोड़ कमा लिए थे… तो नतीजा वही निकलता है जो बार्डर 2 का निकला है।
नमस्कार दोस्तों! आज हम बात करेंगे उस फिल्म की, जिसे लेकर हम सब इमोशनल थे, लेकिन थिएटर से बाहर निकलते वक्त सिर्फ खालीपन महसूस हुआ। क्या यह फिल्म बार्डर की विरासत को आगे ले जाती है या सिर्फ नॉस्टेल्जिया के नाम पर पैसे कमाने की कोशिश है? चलिए, सच जानते हैं।
मुख्य समस्या: आत्मा की कमी
देखिए, वजह बड़ी सिंपल है। 1997 की बार्डर आज भी हमारे दिलों में जिंदा है। हमें सिर्फ सनी देओल याद नहीं थे, हमें मथुरा दास की छुट्टी याद थी, रतन सिंह का बलिदान याद था। लेकिन बार्डर 2 देखते हुए आपको सनी देओल के कैरेक्टर का नाम तक याद रखने की जद्दोजहद करनी पड़ती है।
फिल्म पूरी कोशिश करती है—इमोशनल गाने डालती है, देशभक्ति का तड़का लगाती है, लेकिन दिल नहीं जुड़ता। जबरदस्ती परोसा गया नॉस्टेल्जिया कभी भी ईमानदारी की जगह नहीं ले सकता।
अभिनय और किरदार
बात करें किरदारों की, तो अहान शेट्टी और दिलजीत दोसांझ का ट्रैक सिर्फ इसलिए रखा गया है ताकि उन्हें शहीद दिखाया जा सके। लेकिन विडंबना देखिए, उनकी शहादत देखकर न दिल हिलता है, न आंख नम होती है। और यही इस फिल्म की सबसे बड़ी हार है। ईमानदारी से कहूँ तो अहान शेट्टी को देखकर ऐसा लगता है कि एक्टिंग शायद उनके बस की बात नहीं है।
लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी है। सनी देओल का ओरा आज भी इतना पावरफुल है कि कभी-कभी लगता है स्क्रीन छोटी पड़ रही है। उनकी दहाड़ में आज भी वही दम है। और असली सरप्राइज पैकेज हैं—वरुण धवन। टीज़र के वक्त जिन्हें ट्रोल किया गया था, उन्होंने अपनी सॉलिड और कंट्रोल्ड परफॉर्मेंस से सबकी बोलती बंद कर दी है।
फिल्म के युद्ध दृश्य निराश करते हैं। कहानी 1970 की है, लेकिन VFX 2026 जैसा लग रहा है। समंदर में दिखाया गया युद्ध इतना फेक लगता है कि पुराने जमाने का Rise of Nations गेम भी इससे बेहतर दिखता है। जब विजुअल्स ही आपको फिल्म से बाहर कर दें, तो आप कहानी में कैसे डूबेंगे?
क्लाइमेक्स और अंतिम निष्कर्ष
पूरी फिल्म की रूह आपको फिल्म के अंत में समझ आती है। रेडियो पर शहीदों के नाम की घोषणा होती है—धरमवीर, मथुरा दास, भैरों सिंह… जैसे ही ये नाम आते हैं, रोंगटे खड़े हो जाते हैं। बार्डर 2 के पूरे 3 घंटे 20 मिनट के इमोशन पर बार्डर 1 के वो चंद सेकंड भारी पड़ते हैं। क्योंकि उन्हें हमने अपनी आंखों के सामने शहीद होते देखा था। वही था बार्डर का जादू।
अंतिम वर्डिक्ट:
बार्डर 2 एक ऐसी सीक्वेल है जो पुराने नाम के दम पर चलना चाहती है, लेकिन इसके पास खुद की कोई आत्मा नहीं है।
लेकिन अंत में यही कहूँगा
यह फिल्म भी कॉमेडी, इमोशनल और एक्शन से भरपूर है। यदि आप सनी देओल और बार्डर फिल्म के प्रशंसक है तो आपको यह फ़िल्म देखना चाहिए।
