डॉ.महेन्द्र यादव की पाती थोड़ी जज़्बाती

कविता के मंच पर जब गंभीरता की गर्मी ज्यादा चढ़ जाती थी, तब एक ही नाम राहत की ठंडी फुहार बनकर आता था — काका हाथरसी!
अरे वही, जो माइक के पास आते ही ऐसा लगता था जैसे मंच पर मिर्च-मसाले वाली हँसी का स्टॉल खुल गया हो!
और क्या ग़ज़ब का संयोग देखिए — काका का जन्म और निधन, दोनों ही तारीखें 18 सितंबर!
1906 में जन्मे और 1995 में अलविदा कह गए।
यानी वो खुद ही थे अपनी जयंती के आयोजक… और अपनी पुण्यतिथि के मुख्य अतिथि! 🎤👑
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🤔 कौन थे काका?
असल नाम था प्रभुलाल गर्ग, लेकिन जब तक आप उनका असली नाम याद करेंगे, तब तक वे आपको अपनी किसी कविता से हँसाकर लोटपोट कर चुके होंगे।
‘काका हाथरसी’ नाम से उन्होंने भारत के हास्य-कविता जगत में ऐसा धूम्रपान किया (माफ़ कीजिए, धमाका किया!) कि कवि सम्मेलन उनकी मौजूदगी के बिना अधूरे लगने लगे।
उनकी कविताएँ सिर्फ गुदगुदाती नहीं थीं, वे ‘व्यंग्य’ की ऐसी छुरी थीं जो सिस्टम की खाल उतार देती थी — और सामने वाले को पता भी नहीं चलता था कि वो घायल हो गया है या हँसी से बेहाल!
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📜 उनका लेखन ऐसा था… जैसे हलवा भी और झापड़ भी!
काका की भाषा इतनी सरल और चुलबुली थी कि गाँव का किसान भी हँसता था, और शहर का प्रोफेसर भी।
हास्य और व्यंग्य को उन्होंने आम आदमी की जेब में रख दिया — बिना टैक्स, बिना सर्विस चार्ज!
इसीलिए भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्मश्री’ से नवाज़ा।
भाई, जब हँसी को इतना सीरियसली लिया जाए, तो समझिए कि आदमी वाकई महान रहा होगा।
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🚩 आखिरी यात्रा या कवि सम्मेलन का आखिरी सत्र?
अब सुनिए वो किस्सा, जो शायद आप दोबारा नहीं सुनेंगे।
काका की अंतिम इच्छा थी कि उनकी शवयात्रा ऊँट गाड़ी पर निकाली जाए।
ऊँट गाड़ी!
जी हाँ, सीधा राजस्थान नहीं, श्मशान तक।
ढोल-नगाड़े, भजन मंडली, हँसी-ठिठोली… और उस शवयात्रा में था ऐसा उत्सव, मानो कवि सम्मेलन का ग्रैंड फिनाले हो।
और सबसे ज़बरदस्त बात?
काका ने साफ़ मना कर दिया था कि कोई रोएगा नहीं!
बल्कि उनकी चिता के पास एक हास्य कवि सम्मेलन आयोजित किया गया!
मतलब अग्नि-संस्कार के साथ-साथ श्रोताओं के पेट में भी आग लग रही थी — हँसी की!
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🎭 क्या हम सब थोड़े-थोड़े काका नहीं बन सकते?
काका हाथरसी ने सिर्फ कविताएँ नहीं लिखीं, उन्होंने एक मिसाल छोड़ी कि हँसी कोई ‘हल्की चीज़’ नहीं होती।
ये वो औज़ार है जिससे आप समाज की गांठें खोल सकते हैं, और लोगों के दिल भी।
उनकी कविताएँ आज भी सोशल मीडिया पर घूमती हैं, WhatsApp पर ठहाके बिखेरती हैं, और मंचों पर नए कवियों के लिए एक पाठशाला बनती हैं।
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🎤 और अंत में…
काका के जैसा कोई नहीं।
उनकी ज़िंदगी भी कविता थी, और उनकी मौत भी।
जयंती और पुण्यतिथि एक ही दिन — मानो ब्रह्मा जी ने कैलेंडर देखकर खुद लिखा हो:
> “ये आदमी तो इतना यूनिक है, इसे तारीख़ें भी कॉमन नहीं मिलेंगी!”
तो आइए,
काका की स्टाइल में,
हँसते-हँसते उन्हें याद करें —
क्योंकि अगर आप मुस्कुरा रहे हैं…
तो काका अब भी जिंदा हैं!
