फिल्म समीक्षक : डॉ. महेन्द्र यादव
कुछ फिल्में केवल कहानी नहीं होतीं, वे एक अनुभव होती हैं—धीरे-धीरे खुलता हुआ रहस्य, जो अंत तक दर्शक को बाँधे रखता है। गाइड (1965) ऐसी ही कालजयी फिल्म है। पहली नज़र में यह एक साधारण इंसान की कहानी लगती है, लेकिन जैसे-जैसे कथा आगे बढ़ती है, यह जीवन, प्रेम, भ्रम और आत्मबोध का गहरा रहस्य बन जाती है।
कहानी का केंद्र है एक साधारण-सा पर्यटक गाइड — राजू। वह लोगों को रास्ते दिखाता है, लेकिन खुद अपने जीवन का रास्ता भटक जाता है। परिस्थितियाँ, प्रेम, लालच, अपराधबोध और नियति—सब मिलकर उसके जीवन को ऐसे मोड़ पर ले आते हैं कि वही राजू, जो कभी छल और भ्रम में जीता था, अंततः लोगों की आस्था का केंद्र बन जाता है। क्या वह सच में महात्मा बनता है, या परिस्थितियाँ उसे उस भूमिका में ढाल देती हैं? यही सस्पेंस इस फिल्म को असाधारण बनाता है।
इस फिल्म में देव आनंद ने राजू गाइड का जो अभिनय किया है, वह भारतीय सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर माना जाता है। उनकी अदाकारी में चंचलता भी है, दर्द भी, और अंत में एक आध्यात्मिक गहराई भी दिखाई देती है। उनके साथ वहीदा रहमान ने रोज़ी के किरदार को इतनी संवेदनशीलता से निभाया कि यह चरित्र आज भी याद किया जाता है। सह कलाकारों में किशोर साहू, लीला चिटनिस और अनवर हुसैन ने भी कहानी को मजबूती दी है।
फिल्म का निर्देशन विजय आनंद ने किया, जिनकी कहानी कहने की शैली, कैमरा एंगल और गीतों की फिल्मांकन शैली आज भी फिल्म स्कूलों में चर्चा का विषय बनती है। वहीं संगीत दिया था महान संगीतकार एस. डी. बर्मन ने—और यही संगीत फिल्म की आत्मा बन गया।
इस फिल्म के गीत आज भी उतने ही ताज़ा लगते हैं, मानो अभी-अभी रचे गए हों। खासकर—
आज फिर जीने की तमन्ना है
तेरे मेरे सपने अब एक रंग हैं
दिन ढल जाए
गाता रहे मेरा दिल
इन गीतों में जीवन की उमंग, प्रेम की पीड़ा और समय की नश्वरता—सब कुछ सुनाई देता है।
यह फिल्म क्यों देखनी चाहिए?
क्योंकि यह केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मचिंतन की यात्रा है। यह हमें दिखाती है कि मनुष्य गलती कर सकता है, गिर सकता है, भटक सकता है—लेकिन भीतर की जागृति उसे एक नई ऊँचाई तक ले जा सकती है। फिल्म यह भी बताती है कि समाज कभी-कभी किसी इंसान को उसके वास्तविक रूप से अलग एक प्रतीक बना देता है।
फिल्म का संदेश
जीवन में परिवर्तन संभव है। पश्चाताप, आत्मबोध और विश्वास से इंसान अपनी नियति बदल सकता है। कभी-कभी हम दूसरों को रास्ता दिखाते-दिखाते खुद अपने भीतर का रास्ता खोज लेते हैं।
यही कारण है कि गाइड केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि एक अनुभव है—ऐसा अनुभव जो आपके जीवन की दशा और दिशा बदलने का सामर्थ्य रखता है।
लगभग 2 घंटे 50 मिनट की यह अद्भुत फिल्म YouTube पर उपलब्ध है।
अगर आपने इसे अभी तक नहीं देखा है, तो सच मानिए—आप भारतीय सिनेमा के एक अनमोल अध्याय से वंचित हैं। इसे अवश्य देखें।
