महान व्यक्तित्व के धनी आगमोद्धारक आचार्य आंनद सागर सूरीश्वरजी महाराज
विनम्रता में गौतम स्वामी , पवित्रता में स्थूली भद्रजी, तपस्या में धन्ना अणगारजी, ग्रंथ रचनाओं में हरिभद्रसूरीजी और हेमचन्द्राचार्य जी का नाम प्रसिद्ध है ! ठीक इसी तरह जिनागमो की सुरक्षा के लिए ज्ञान तीर्थ , आगमोद्धारक आनंदसागर सूरीश्वरजी महाराज का नाम प्रसिद्ध हुआ, भगवान महावीर के 2550 साल के शासन काल में अनेक जिनशासक प्रभावक जैनाचार्य हुए है !इसी प्रकार आगम की सुरक्षा और लेखन के लिए अपना संपूर्ण जीवन समर्पित करने वाले जैनाचार्य आनंद सागर सूरीश्वरजी महाराज साब हुए हैं,पूरा देश आपका 151 वाँ जन्मदिन मना रहा है ! आपने अपने जीवन में 8,21,457 श्लोक प्रमाण और 175 की संख्या में आगम प्रकरण सैद्धांतिक ग्रंथों का संपादन किया , 70 से 80 हज़ार श्लोक प्रमाण, 223 ग्रंथों का नया सर्जन , 20 हज़ार श्लोक प्रमाण गुजराती एवं हिन्दी ग्रंथों का सर्जन किया , 80 ग्रंथों पर कठिन संस्कृत भाषा में 15 हज़ार श्लोक प्रमाण प्रस्तावना लिखी , 2 लाख श्लोक प्रमाण आगम ग्रंथों का 24✖️30 साइज के पेपर पर सर्वांग शुद्ध मुद्रण यानी आगम मंजुषा का मुद्रण करवाया , इसके अतिरिक्त आपके द्वारा अनेक ग्रंथ , अष्टक आदि की रचना की जो आज भी हस्तलिपि में मौजूद है ! ज्ञान के क्षेत्र में विशाल साहित्य के रचियता ने कभी लाइट/ दीपक का उपयोग नहीं किया! आपने अनेक आगमो का मुद्रण करवाकर आने वाली पीढ़ी के लिए सुरक्षित किया ! कागज पर लिखी हुई बातें नष्ट हो सकती है , जल सकती है पानी में गल सकती है लेकिन आपने पालीतणा ( जैनतीर्थ ) में आगम मंदिर बनवाया जिसमें पाषाण के पत्थरों पर 45 आगमों को अंकित करवाया , दूसरा आगम मंदिर सूरत में बनवाया जहाँ पर आपने ताड़पत्र पर आगम अंकित करवाया ! आपके इन अद्भुत और अविश्वसनीय कार्य के लिए आपको आगमोद्धारक के पद से विभूषित किया गया !
आपने तीर्थों की रक्षा का कार्य भी किया 20 तीर्थंकरों की पावन भूमि शिखर जी पर अंग्रेजों द्वारा बनाये जाने वाली होटल का विरोध किया , युवाओ में वीर रस झरते हुए प्रवचनों से उन्हें संगठित कर आंदोलन किया तब जाकर ब्रिटिश सरकार ने अपना निर्णय परिवर्तित किया !
पालीतणा के लालची राजा ने शत्रुंजय की यात्रा पर आने वाले यात्रियों पर एक मोहर सोना टैक्स के रूप में लेने का निर्णय लिया , तब कोर्ट में कैस गया तब 10 हज़ार रू. प्रतिवर्ष देने का निर्णय लिया उस समय यह राशि बहुत बड़ी होती थी सागरजी महाराज ने चार लाख चाँदी के सिक्के अहमदाबाद में और आठ लाख सिक्के दूसरे श्री संघों से एकत्रित किये यह सारे सिक्के कल्याणजी आनंदजी पेढ़ी को सौंपे गए , और उसके ब्याज से यह टैक्स जमा होने लगा ! स्वतंत्रता के पश्चात् यह टैक्स समाप्त हो गया ! तब आपने कहा कि गिरीराज की सम्पत्ति का उपयोग गिरीराज के लिए होना चाहिए, इस राशि का प्रयोग सीढ़िया बनाने में खर्च कर यात्रियों की यात्रा आसान कर देना चाहिए, आज जिन सीढ़ियो को चढ़कर हम दादा आदिनाथ के दर्शन करने जाते है उन सीढ़ियो का निर्माण आपकी प्रेरणा से ही हुआ !
उनके बारे में लिखते हुए सर्वमान्य पंडित सुखलाल जी ने कहा था कि “ अगर यह महापुरुष विदेश में होते तो इनकी सोने की प्रतिमा लगाई जाती “
प.पू. आचार्य भगवंत श्री मद विजय कुशल चंद्र सूरीश्वरजी महाराज ने कहा था की – ”कोई 1 भव में 2 भव का कार्य करता है , कोई 7 भव का कार्य करता है , परंतु आगमोद्धारक सागरजी महाराज ने एक भव में 70 भव का कार्य किया है ।”
प.पू.विजय जी महाराज जो आगम संशोधन के रूप में प्रसिद्ध थे ने एक बार कहा था ”जो काम सागरजी महाराज ने किए है वह व्यक्ति के बस की बात नहीं है , जरूर उनका कुंडलिनी जागरण हुआ होगा !”
ऐसे रत्न इस देश कों प्राप्त हुए है , हम ऐसे संत को अन्तर्मन से याद करते है ! तथा श्रद्धा सुमन अर्पित करते हुए कहते है-