लंदन , सैकडों साल पहले संदेश पहुंचाने के लिए इंसानों के पास कबूतर सबसे भरोसेमंद ज़रिया हुआ करते थे। यह कबूतर सैकड़ों किलोमीटर दूर जाकर भी अपने घर सही-सलामत लौट आते थे। चाहे प्राचीन रोम हो या दूसरे विश्व युद्ध का दौर, कबूतरों ने संदेशवाहक के रूप में इंसानों की बड़ी मदद की। उनकी दिशा पहचानने की अद्भुत क्षमता ने उन्हें इतिहास में खास दर्जा दिलाया। वैज्ञानिकों का मानना है कि कबूतर पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का उपयोग करके रास्ता ढूंढते हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि वे इस चुंबकीय जानकारी को पहचानते और समझते कैसे हैं? इसी को समझने के लिए वैज्ञानिक लगातार रिसर्च कर रहे हैं। 2012 में वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण खोज की। उन्होंने पाया कि जब कबूतर को चुंबकीय क्षेत्र में रखा जाता है, तो उसके आंतरिक कान से जुड़ी ब्रेनस्टेम कोशिकाएं सक्रिय हो जाती हैं। ह्यूस्टन के बायलर कॉलेज ऑफ मेडिसिन के न्यूरोसाइंटिस्ट जे. डेविड डिकमैन ने इस रिसर्च की अगुवाई की। उनके अनुसार, ये ब्रेन कोशिकाएं चुंबकीय क्षेत्र की दिशा, गति और ध्रुवता का संकेत देती हैं। आसान शब्दों में कहें तो कबूतर के दिमाग में एक प्राकृतिक GPS सिस्टम होता है, जो उसे रास्ता दिखाता है। पहले यह माना जाता था कि कबूतरों की चोंच में आयरन से भरपूर न्यूरॉन्स होते हैं, जो चुंबकीय जानकारी दिमाग तक पहुंचाते हैं। लेकिन बाद में वैज्ञानिकों ने इस धारणा को गलत साबित किया। ऑस्ट्रिया के वियना स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ मॉलिक्यूलर पैथोलॉजी के वैज्ञानिक डेविड कीज और उनकी टीम ने पाया कि चोंच में मौजूद आयरन वाली कोशिकाएं असल में न्यूरॉन्स नहीं, बल्कि मैक्रोफेज नामक सफेद रक्त कोशिकाएं हैं। ये कोशिकाएं पक्षी की प्रतिरक्षा प्रणाली का हिस्सा होती हैं और पुरानी लाल रक्त कोशिकाओं को रीसायकल करने की वजह से इनमें आयरन होता है। वैज्ञानिकों ने बताया कि ये कोशिकाएं पूरे पक्षी के शरीर में पाई जाती हैं, खोपड़ी से लेकर पंखों तक। कबूतरों की यह अद्भुत क्षमता उन्हें सिर्फ दिशा पहचानने में ही नहीं, बल्कि स्वस्थ रहने में भी मदद करती है। दिलचस्प बात यह है कि सिर्फ कबूतर ही नहीं, बल्कि ट्राउट मछली, कछुए और अन्य कई जानवर भी चुंबकीय क्षेत्र का इस्तेमाल करके अपना रास्ता पहचानते हैं।
