बलरामपुर, चिलचिलाती धूप के बाद मानसून का आगमन लोगों को राहत तो पहुंचाता है, पर इस मौसम में कई बीमारी होने की संभावना भी बढ़ जाती है। दूषित पानी से डायरिया और पानी जमने से मच्छर जनित बीमारी आम बात है। वहीं, नमी और तापमान में लागातार उतार-चढ़ाव की वजह से अस्थमा, एलर्जी और सांस की समस्या लोगों को ज्यादा परेशानी में डाल देती है। वातावरण में फंगस, बैक्टीरिया, वायरस और धूल के कण अस्थमा, सीओपीडी और एलर्जी के मरीजों का ट्रिगर बन जाती है। बारिश में बंद घरों में स्वच्छ हवा के नहीं पहुंचने से इन सभी समस्याओं के बढ़ने की संभावना दोगुनी हो जाती है। हालाकि, विशेषज्ञ डॉक्टरों का कहना है कि मौसम के अनुरूप यदि अपनी दिनचर्या कर ली जाये और योग-व्यायाम से अपने को जोड़ लिया जाये तो ऐसी समस्या से हम बचकर रह सकते है।
छाती रोग विशेषज्ञ डॉ. नेहा कुमारी ने बताया कि बदलते मौसम में सांस के मरीज तो बढ़ ही जाते हैं। परेशानी लापरवाही बतरने वालों को ज्यादा होती है। प्रदूषण की वजह से एलर्जी के मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। बच्चों में एलर्जी की समस्या बहुत ही कम उम्र में देखने को मिल रही है। लंग कैंसर के मामले भी बढ़ रहे हैं। उन्होंने आगे बताया कि अस्थमा और सीपीडी में सबसे कारगर इन्हेलर है। यह दवाओं से कम दुष्प्रभाव डालता है और सुरक्षित है। इन्हेलर को लेकर भ्रांति है। इसे समझने के लिए दवा और इन्हेलर में तुलना करनी होगी। जैसे शरीर में दर्द या बुखार होने पर दवा लेते हैं। दवा हमेशा मिली ग्राम में होती है। यानी 500 या 650 एमजी। दवा लेने से यह शरीर के सभी महत्वपूर्ण अंगों से होते हुए खून और दर्द वाली जगह तक पहुंचती है। यानी जरूरत वाली जगह के अलावा अन्य जगहों पर वह दुष्प्रभाव डालेगी। वहीं इन्हेलर के रूप में जो दवा लेते हैं वो महीने भर के मरीज 12 एमजी दवा लेते हैं। वहीं पूरे साल लेने पर 144 मिली ग्राम, वह भी सांस की नली में, पूरे शरीर में नहीं जाता है।
संयमित जीवन से होगा फायदा
आयुर्वेद चिकित्सक डॉक्टर वीके पांडेय के बताया कि बरसात के मौसम में पाचन कमजोर हो जाता है। शरीर के भीतर अम्ल बढ़ जाता है जिससे हमारा पाचन तंत्र कमजोर हो जाता है। ऐसे में तला हुआ भोजन कम करें। साफ और स्वच्छ पानी में खाना तैयार करें। देर का बना हुआ खाना नहीं खाए। दही, केला, खीर, मूली और ठंडी चीजों का सेवन न करें। च्यवनप्राश, संजीवनी वटी, लक्ष्मी विलास रस इस समय लाभकारी होता है।
होम्योपैथी की दवा इस मौसम में कारगरहोम्योपैथी चिकित्सक वूएस वर्मा ने बताया कि बरसात के मौसम में भीगने से एलर्जी की समस्या उत्पन्न होती है। इससे बचने के लिए होम्योपैथी में रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाया जाता है। ठंड की प्रकृति वाले खाद्य पदार्थ व फल के उपयोग से बचे। योग को इस मौसम में नियमित रूप से अपनी दिनचर्या में शामिल करें।
सांसों की बीमारी में योग ज्यादा लाभकारीयोग चिकित्सक अनीता कुमारी ने बताया कि अस्थमा और सीओपीडी एक गंभीर क्रोनिक बीमारी है। इसमें रोगी को सांस फूलने, दम घुटने और सांस लेने में तकलीफ होती है। इन सभी बीमारियों में योग कारगर साबित होता है। कोरोना काल में इसकी पुष्टि भी हो चुकी है। पवनमुक्तासन, भुजंगासन, धनुरासन और अनुलोम विलोम प्राणायाम से लाभ पहुंचता है।
अस्थमा और सीओपीडी में अंतर
विशेषज्ञों के अनुसार, अस्थमा एक एलर्जी है जो गले में वायु के सूजन के कारण होती है। यह किशोरावस्था में ज्यादा होता है। हालांकि यह किसी भी अवस्था में हो सकती है। यह बीमारी ठीक होने वाली होती है। मरीज को बीच-बीच में समस्या होती है। यह दवा और परहेज से ठीक हो सकती है। कम उम्र में सर्दी खांसी की समस्या होती है। 80 फीसदी लोगों को एलर्जिक राइनाइटिस होता है जिससे छींक और नाक से पानी आता है। सांस लेने में दिक्कत होती है और यह आनुवंशिक भी होता है। वहीं सीओपीडी (क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज) यह वैसे लोगों में होता है जो धूम्रपान ज्यादा करते हैं। ऐसी महिलाएं जो खाना बनाने में जलावन का या कोयला का उपयोग ज्यादा करती हैं। बंद कमरे में जलावन से खाना बनाने वाली महिलाओं में ज्यादा परेशानी देखी जाती है। इसमें फेफड़ा प्रभावित होता है। बीमारी धीरे-धीरे बढ़ती है। यह 40 साल से ज्यादा उम्र के लोगों में होती है। इसमें पहले की अवस्था में मरीज के आने की संभावना कम रहती है। इसके लक्षण में सांस फूलने की समस्या लंबे समय तक रहती है। बलगम हमेशा आता रहता है।
