डॉ. महेन्द्र यादव की पाती थोड़ी जज्बाती
मनुष्य के जीवन की दिशा बाहरी परिस्थितियाँ नहीं, उसकी स्वयं की सोच तय करती है। जब कोई व्यक्ति बार-बार खुद से यह कहता है कि वह कुछ नहीं कर सकता, वह असफल रहेगा, वह दूसरों से कमतर है – तो धीरे-धीरे वह वैसा ही बन जाता है। उसकी सोच, उसकी चाल, उसका आत्मविश्वास और उसका व्यवहार भी उसी दिशा में ढलने लगता है। यह एक अदृश्य प्रक्रिया है, पर अत्यंत प्रभावशाली।
हमें जीवन में बार-बार यह समझाया गया है कि सफलता का रास्ता मेहनत से होकर जाता है, पर उस मेहनत की नींव होती है – स्वयं पर विश्वास। स्वयं को श्रेष्ठ मानना, योग्य मानना, काबिल समझना – यह कोई घमंड नहीं बल्कि आत्म-स्वीकृति है। जब आप खुद को महत्त्व देते हैं, तो आप खुद के भीतर छिपे सामर्थ्य को जागृत करते हैं। जब आप खुद को मूल्यहीन मानते हैं, तो भीतर की सारी ऊर्जा शिथिल हो जाती है।
जिस व्यक्ति ने कभी स्वयं को लेखक मान लिया, वह धीरे-धीरे लिखना शुरू करता है, विचार आने लगते हैं, कल्पनाएँ आकार लेने लगती हैं और एक दिन वही व्यक्ति किताब लिख देता है। कोई जो खुद को वक्ता मानने लगता है, वह बोलने की हिम्मत जुटाता है, अभ्यास करता है, और फिर मंच पर खड़ा होकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर देता है। यह सब एक विचार से शुरू होता है – “मैं कर सकता हूँ। मैं हूँ। मैं बन सकता हूँ।”
हमारा मन बहुत चतुर है, वह जैसा आदेश हम उसे देंगे, वैसा ही व्यवहार करेगा। अगर हम बार-बार अपने ही दोषों को दोहराते रहेंगे – “मैं असफल हूँ, मैं डरपोक हूँ, मैं साधारण हूँ” – तो यह शब्द हमारी आदत बन जाएंगे और अंततः हमारा स्वभाव। पर यदि हम अपने भीतर यह आवाज़ पैदा करें – “मैं सक्षम हूँ, मैं सीख सकता हूँ, मैं बदलाव ला सकता हूँ” – तो मन उसी के अनुरूप कार्य करने लगेगा।
दुनिया के महानतम व्यक्तित्वों ने दूसरों से पहले खुद को स्वीकारा, खुद पर विश्वास किया। उन्होंने यह तय किया कि वे कौन हैं और क्या बनना चाहते हैं। उनका आत्मबोध इतना प्रबल था कि कठिनाइयाँ भी उनकी राह नहीं रोक सकीं। क्योंकि वे जानते थे – “मैं वही बनूँगा, जैसा मैं खुद को मानता हूँ।”
हमारा दुर्भाग्य तब होता है जब हम अपनी पहचान दूसरों की राय से तय करने लगते हैं। कोई कुछ कह दे, कोई आलोचना कर दे, तो हम खुद को संदेह की निगाह से देखने लगते हैं। पर सच्चाई यह है कि दूसरों की राय अस्थायी है, हमारी सोच स्थायी। और वही सोच तय करती है कि हम कौन हैं और क्या बन सकते हैं।
इसलिए सबसे पहली ज़रूरत है खुद को बेहतर नज़र से देखने की। खुद को प्रेम करने की। खुद की काबिलियत पर यक़ीन करने की। अगर हम चाहते हैं कि जीवन में कुछ असाधारण घटे, तो सबसे पहले खुद को असाधारण मानना होगा।
क्योंकि अंत में,
“व्यक्ति वही बन जाता है, जैसा वह खुद को मानता है।”
तो क्यों न आज से ही हम खुद को वो मानें – जो हम बनना चाहते हैं?
