विशेष…ध्यानार्थ…
राहुल गांधी और कांग्रेस ने महाकुंभ से किया किनारा, ममता बनर्जी और अखिलेश यादव के बिगड़े बोल
-प्रदीप कुमार वर्मा
प्रयागराज में गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम पर आयोजित विश्व के सबसे बड़े जन समागम के रूप में महाकुंभ अब अपने अंतिम दौर में है। महाशिवरात्रि पर अंतिम शाही स्नान के साथ महाकुंभ सम्पन्न हो जाएगा। महाकुंभ में अब तक करीब 70 करोड़ सनातनियों ने आस्था और विश्वास की डुबकी लगाकर अपने जीवन को धन्य किया है और संगम के घाट पर अभी भी सनातन धर्म को मानने वालों की मौजूदगी है। महाकुंभ के सफल आयोजन के बाद लोगों के दिलोदिमाग में राजनीतिक व्यक्तित्व के रूप में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हिंदू हृदय सम्राट के रूप में स्थापित हुए हैं। वहीं, भाजपा को भी नई प्राणवायु मिली है। लेकिन विपक्ष द्वारा महाकुंभ के तिरस्कार को भी देश और दुनिया में एक नए राजनीतिक आयाम के रूप में देखा जा रहा है। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस ने जहां महाकुंभ से पूरी तरह किनारा किया है, वही, टीएमसी की मुखिया ममता बनर्जी ने महाकुंभ को “मृत्युकुंभ” कहकर सनातन के विरुद्ध एक और मौका भाजपा को दे दिया है। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश में मुख्य विपक्षी दल सपा एवं टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी द्वारा भी महाकुंभ के आयोजन पर सनातन विरोधी और हिंदू आस्था को ठेस पहुंचाने वाली टिप्पणियां लगातार जारी है। जिसके बाद विपक्ष के राजनीतिक भविष्य को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है।
कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष एवं नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी तीन दिन पूर्व अपने संसदीय क्षेत्र रायबरेली में थे। रायबरेली से संगम क्षेत्र प्रयागराज करीब 120 किलोमीटर की दूरी पर है और वहां तक पहुंचने में मात्र 2 घंटे का समय लगता है। तीन दिन के रायबरेली “प्रवास” के बावजूद भी राहुल गांधी का महाकुंभ में शिरकत नहीं करना अब राजनीति के साथ-साथ आम लोगों में भी चर्चा का विषय बन गया है। इसके साथ ही राहुल गांधी की बहन एवं कांग्रेस की महासचिव प्रियंका गांधी और रायबरेली से कई बार की सांसद सोनिया गांधी भी महाकुंभ में शिरकत करने नहीं पहुंची है। इससे पूर्व भी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे महाकुंभ पर अपने बयान “गंगा में डुबकी लगाने से क्या गरीबी दूर होगी..” से सनातनियों के निशाने पर आ चुके है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश से लेकर दिल्ली और पूरे देश में कांग्रेस के कई स्थानीय क्षेत्र भी पार्टी अध्यक्ष एवं नेता प्रतिपक्ष के सुर में सुर मिलाकर सनातन को कोसते रहे हैं। सनातन को डेंगू और मलेरिया खाने वाले कांग्रेस नेताओं को बयान भी अभी लोगों की स्मृतियों में अंकित हैं। इस प्रकार महाकुंभ कांग्रेस का किनारा करने से आने वाले चुनाव में कांग्रेस की नैया कैसे पर होगी यह एक यक्ष प्रश्न है।
कभी कांग्रेस का हिस्सा रही तृणमूल कांग्रेस के मुखिया ममता बनर्जी का भी सनातन के प्रति आघोषित तिरस्कार जग जाहिर है। दुर्गा पूजा के आयोजनों की अनुमति में “आनाकानी” से लेकर मौलवियों को वेतन तथा अन्य सुविधाएं प्रदान करना उनकी मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति को दर्शाता है। पश्चिम बंगाल चुनाव में बांग्लादेशियों को कथित रूप से बसाना भी उनकी राजनीतिक विचारधारा का एक हिस्सा रहा है। टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी द्वारा महाकुंभ के दौरान भगदड़ में हुई मौत के बाद महाकुंभ को “मृत्युकुंभ” कहकर संबोधित किया गया। ममता बनर्जी का यह बयान हिंदू सनातनियों की आस्था को ठेस पहुंचा रहा है और इसके लिए ममता बनर्जी की आलोचना भी हो रही है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की मुस्लिम तुष्टिकरण वाली विचारधारा से उनको एक बार फिर से सत्ता नसीब हो चुकी है और पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में अभी थोड़ा समय है। लेकिन ऐसे कयास लग रहे हैं कि इंडिया गठबंधन की मुखिया बनने के ख्वाब देख रही ममता बनर्जी का महाकुंभ को मृत्युकुंभ बताने वाला बयान उनकी राष्ट्रीय राजनीति में बढ़ते कद ओर इंडिया गठबंधन की मुखिया बनने के ख्वाब को तोड़ सकता है।
महाकुंभ को लेकर देश के विपक्ष में कांग्रेस के बाद संसदीय राजनीति के लिहाज से राष्ट्रीय स्तर पर दूसरी सबसे बड़ी पार्टी सपा की सोच भी कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस से मिलती है उत्तर प्रदेश में मुख्य विपक्षी दल के रूप में स्थापित सपा के मुखिया अखिलेश यादव महाकुंभ को लेकर कई बार सवाल उठा चुके हैं। इनमें महाकुंभ के आयोजन के औचित्य, व्यवस्थाओं, इतिहास तथा सरकारी धन के दुरुपयोग जैसे आरोप शामिल है। महाकुंभ के प्रति सपा मुखिया की सोच और बिगड़े बोल का आलम यह है कि वह संगम के पवित्र गंगाजल को आचमन के साथ-साथ नहाने के लिए भी हानिकारक बता चुके हैं। सपा मुखिया के साथ-साथ उनके अग्रज तथा परिवार के रामगोपाल यादव एवं शिवपाल यादव भी महाकुंभ के आयोजन पर उत्तर प्रदेश एवं केंद्र सरकार को घेर चुके हैं। सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव से लेकर वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति किसी से छुपी नहीं है। राम मंदिर निर्माण के दौरान कार सेवक हिंदुयों पर गोली चलाने के दाग अभी तक सपा के दामन पर है। राम मंदिर बनने के बाद सपा मुखिया का दर्शन करने नहीं जाने को भी राजनीतिक प्रेक्षक उनकी सनातन विरोधी मानसिकता मानते हैं।
उधर, विपक्ष के तिरस्कार के उलट भाजपा की केंद्र और उप्र राज्य की डबल इंजन की सरकार महाकुंभ के आयोजन को लेकर अपनी मंशा में पूरी तरह सफल रही है। महाकुंभ में देश के सर्वोच्च पद पर आसीन राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से लेकर देश के कार्यकारी प्रमुख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी,गृहमंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा एवं पीयूष गोयल सहित लगभग सभी केंद्रीय मंत्रियों और भाजपा के बड़े नेताओं ने संगम में डुबकी लगाई है। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपनी पूरी कैबिनेट के साथ कई बार संगम के पवित्र जल में डुबकी लगाकर सनातन के प्रति अपनी आघात श्रद्धा का परिचय दिया है। देश के भाजपा शासित एवं घटक दलों की सहभागिता वाले कई राज्यों के मुख्यमंत्री एवं राजनीतिक महाकुंभ में अपनी सहभागिता दर्ज कर चुके हैं। इस पूरी कवायद से महाकुंभ में हिंदू एवं सनातनी एकता जीवंत हुई है। यही नहीं महाकुंभ से पूर्व हुए हरियाणा एवं महाराष्ट्र चुनाव में खूब चले हिन्दू एकता वाले नारे एक रहेंगे, तो नेक रहेंगे…, एक रहेंगे, तो शेफ रहेंगे… तथा काटेंगे तो बाटेंगे जैसे नारों की भी प्रासंगिकता महाकुंभ में देखने को मिली है।
देश की राजनीति में हिंदू एकता और सनातन के बढ़ते प्रभाव की दम पर भाजपा ने हरियाणा एवं महाराष्ट्र में जीत दर्ज की। राजनीति के पंडितों का मानना है कि दिल्ली चुनाव की पृष्ठभूमि में महाकुंभ के आयोजन से उपजी हिन्दू एकता शुरुआत से लेकर महाकुंभ के अपने अंतिम दौर तक हावी रही है। दिल्ली विधानसभा चुनाव में मतदान वाले दिन 05 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली से करीब 675 किलोमीटर दूर प्रयागराज के संगम में आस्था की डुबकी लगाकर देश,विशेषकर दिल्ली के सनातनियों को खास संदेश दिया। नतीजतन देश की राजधानी “इंद्रप्रस्थ” में भाजपा का 27 साल पुराना राजनीतिक बनवास खत्म हुआ। महाकुंभ से जहां देश और दुनिया में उत्तर प्रदेश और केंद्र सरकार की साख बढ़ी है,वहीं सामाजिक समरसता एवं सनातनी एकता के चलते भी हिंदू समाज एक सूत्र में बंध गया है। महाकुंभ में भाजपा की सक्रिय भागीदारी एवं समर्पण के उलट कांग्रेस एवं सपा सहित संपूर्ण विपक्ष के तिरस्कार से अब ऐसा लगता है कि विपक्ष की जाति जनगणना और पीडीए जैसे फार्मूले पूरी तरह फेल हो चुके हैं। इसके साथ ही यह सवाल भी बना हुआ है की महाकुंभ के जरिये विपक्ष द्वारा सनातन के तिरस्कार के बाद इसी साल होने वाले बिहार सहित अगले साल 2026 में असम,तमिलनाडु,केरल एवं पश्चिम बंगाल में होने वाले विधानसभा चुनाव में विपक्ष की चुनावी नैया कैसे पार होगी?
-लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।
