चोरी की कविता पर हल्ला मचाने वाले कवि ईमानदारी से यह बताएं कि असली दोषी कौन है?
आजकल सोशल मीडिया पर चोरी की कविताओं का ऐसा बवंडर उठा है, जैसे साहित्य का समुद्र मंथन हो रहा हो और अमृत की जगह केवल विष उभर रहा हो। एक के बाद एक, कवि अपनी चमचमाती तलवारें निकाल कर चोरी की कविताओं पर प्रहार कर रहे हैं, मानो साहित्य के न्यायाधीश बन बैठे हों। लेकिन मजेदार बात यह है कि ये वही लोग हैं, जिन्होंने स्वयं इसी खेल से अपने नाम का सिक्का जमाया है।
हद तो तब हो गई जब एक अंतर्राष्ट्रीय कवि, जो मंचों पर चोरी की कविता पढ़कर ही प्रसिद्ध हुए थे, ने चोरी की कविता पढ़ने वालों के खिलाफ सोशल मीडिया पर गुस्से से आग उगलनी शुरू कर दी। यह दृश्य उतना ही मनोरंजक था, जितना कि स्वयं चोर का अपने माल पर पुलिसिया पहरा देने का स्वांग करना।
आज की चर्चा का सूत्रधार कोई और नहीं, बल्कि मेरे एक पुराने मित्र हैं। इन्होंने अपनी एक महिला मित्र को, जो कभी ऑर्केस्ट्रा में गाया करती थीं, संचार क्रांति के दौर में कवि सम्मेलन के मंच पर लाकर खड़ा कर दिया। ऑर्केस्ट्रा तो बंद हो गया था, पर इस महिला की आवाज़ की भूख खत्म नहीं हुई। मित्र महोदय ने उस महिला को कविताओं के गीत लिख कर दिए और उसे मंच पर चुहल बाजी करने का तरीका सिखाया। धीरे-धीरे, इस महिला की मंचों पर डिमांड बढ़ गई, वह देशभर में एक ‘प्रसिद्ध कवयित्री’ के रूप में मशहूर हो गईं। साहित्य से कोसों दूर, लेकिन मंचों पर मांग ऐसी कि आयोजक/सूत्रधार को इन्हे कवि सम्मेलन में बुलाना मजबूरी हो गया।
में यह नहीं कहता कि इस दौर में मौलिक कवयित्रियों ने इस क्षेत्र से पूर्णतः पलायन कर लिया है। कई शालीन और साहित्य के प्रति समर्पित कवयित्री अपनी स्वरचित कविताओं के साथ काव्य मंचों पर डटी हुई हैं, और नवोदित मौलिक कवयित्रियां भी कवि सम्मेलनों में आ रही हैं। बुद्धिजीवी श्रोता और साहित्य के प्रति समर्पित आयोजक/सूत्रधारों की संख्या भी कम नहीं है, और यह मौलिक कवयित्रियों को ही आमंत्रित करते हैं।
फिर भी, लगभग 40% कलाकार (जिनमें गायिकाएं, डांसर और एंकर भी शामिल हैं) ने कवयित्री का चोला पहनकर काव्य मंचों पर सक्रियता से कदम रखा है। इसका नतीजा यह हुआ कि कवि सम्मेलन के मंचों से हिंदी साहित्य की उच्च कोटि की कवयित्रियों की जगह इन ‘मंचीय कलाकारों’ ने लेना शुरू कर दिया।
धीरे-धीरे, यह तथाकथित कवयित्रियां उन महिला कलाकारों की आइडल बन गईं, जिन्होंने साहित्य से ज्यादा मंच की चकाचौंध को अपनाया। उन्होंने लंपट और लूज कैरेक्टर कवियों को अपना निशाना बनाया, और यह कवि लोग भी इनके चक्कर में पढ़कर इन्हें कविताएं गीत लिख कर देने लगे। जब श्रोताओं ने भी कविता सुनने की बजाय ‘कविता को देखने’ में रुचि लेना शुरू कर दी, तब हिंदी कविता के मंच का स्वरूप ही बदल गया।
लेकिन, सुधि श्रोताओं और हिंदी साहित्य को जन-जन तक पहुंचाने वाले आयोजकों की वजह से मौलिक कवयित्रियों को मंच मिलता रहेगा, और नवोदित मौलिक कवयित्रियां भी काव्य मंचों पर आती रहेंगी। इस आस्था को साहित्य प्रेमियों के बीच जीवित रखने की जरूरत है।
**समझने योग्य सीख:**
आज जो कवि सोशल मीडिया पर चोरी की कविता पर शोर मचा रहे हैं, उन्हें यह जानना चाहिए कि असली समस्या मंचीय साहित्य की गिरावट में है। इस स्थिति के लिए वे भी उतने ही जिम्मेदार हैं, जिन्होंने शुद्ध साहित्य से समझौता किया और इसे व्यवसायिकता के हवाले कर दिया। जब तक साहित्य को उसकी शुद्धता और गहराई से नहीं जोड़ा जाएगा, और कवि सम्मेलन की गरिमा को बहाल नहीं किया जाएगा, तब तक यह पराभव जारी रहेगा। साहित्य की प्रतिष्ठा को बहाल करने के लिए ईमानदारी से आत्ममंथन आवश्यक है।
