27 फरवरी को होंगे 60 सदस्यीय नगालैंड विधानसभा चुनाव
कोहिमा । नगालैंड की राजनीति में वर्षों से खुद को स्थापित करने की कोशिश से लेकर राज्य के साथ एक ऐतिहासिक संबंध का दावा करने और एक राष्ट्रीय पार्टी बनने की स्थिति पर नजर रखने तक बिहार के क्षेत्रीय दल 27 फरवरी को होने जा रहे 60 सदस्यीय नगालैंड विधानसभा चुनाव में अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। कुछ राष्ट्रीय दलों और कई निर्दलीय उम्मीदवार सहित 13 पार्टियों में से नगालैंड चुनाव में बिहार के तीन दल जद (यू), राजद और लोजपा (रामविलास) शामिल हैं। जहां जद (यू) 2003 से नगालैंड में चुनाव लड़ रही है और सीटें जीत रही है, वहीं चिराग पासवान के नेतृत्व वाली लोजपा (आरवी) भी अब 19 उम्मीदवारों के साथ राज्य के चुनावी मैदान में उतर गई है। पिछले साल अक्टूबर में, बिहार के मुख्यमंत्री और जद (यू) सुप्रीमो नीतीश कुमार ने जयप्रकाश नारायण की 120वीं जयंती पर नगालैंड का दौरा किया था। इसका मकसद न केवल समाजवादी आइकन की विरासत पर अपना दावा जारी रखना था, बल्कि वे नगालैंड के साथ रिश्तों को भी जाहिर करना चाहते थे।
एक अंग्रेजी अखबार के मुताबिक 1950 के दशक में राज्य में उथल-पुथल के दौरान जब अंगामी ज़ापू फ़िज़ो के तहत नागा नेशनल काउंसिल ने भारत से स्वतंत्रता की घोषणा की थी, जिसके बाद भारतीय सेना की कार्रवाई हुई थी। उस दौरान जेपी ने नगालैंड क्षेत्र के गांवों में बड़े पैमाने पर यात्रा की थी। बाद में 1964 में, जब नगालैंड बैपटिस्ट चर्च काउंसिल ने एक शांति मिशन की स्थापना की, जेपी भी भी असम के मुख्यमंत्री बीपी चालिहा और एंग्लिकन पुजारी माइकल स्कॉट के साथ इसके सदस्यों में से एक थे। राज्य में चुनाव लड़ रहे अधिकांश दलों की तरह, जद (यू) ने घोषणा की है कि वह चुनाव के बाद गठबंधन के लिए खुला है। दिलचस्प बात यह है कि पार्टी ने भाजपा से जुड़ी सरकार में शामिल होने से भी इनकार नहीं किया है, भले ही नीतीश कुमार ने पिछले महीने बिहार में पत्रकारों के एक सवाल के जवाब में कहा था कि वह एनडीए के साथ फिर से गठबंधन करने के बजाय मरना पसंद करेंगे।
