नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने चंडीगढ़ शहर के फेज-1 में एकल आवासीय इकाइयों को फ्लोर वाइज अपार्टमेंट में बदलने पर रोक लगा दी है। फेज-1 में एक समान अधिकतम ऊंचाई के साथ मंजिलों की संख्या तीन तक सीमित की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये रोक भारत के पहले नियोजित शहर की विरासत की स्थिति के साथ-साथ स्थिरता के सिद्धांत के मद्देनज़र जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच एक उचित संतुलन बनाने की भी आवश्यकता है।
जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस बीवी नागरत्ना की पीठ ने कहा यह देखते हुए कि यूनियन टेरटरी एडमिनिस्ट्रेशन ने विवादास्पद चंडीगढ़ अपार्टमेंट रूल्स 2001 को निरस्त कर दिया चुका है जिसमें इस प्रैक्टिस को रेगुलराइज़ करने की मांग की गई थी। प्रासंगिक अधिनियमों और नियमों के आलोक में और 2001 के नियमों के निरसन के मद्देनजर चंडीगढ़ के पहले चरण में आवासीय इकाई का कोई भी विखंडन विभाजन द्विभाजन और अपार्टमेंटकरण निषिद्ध है।
दरअसल 2001 के नियमों की घोषणा के बाद केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ में आवासीय भूखंडों को अपार्टमेंट के रूप में निर्माण या उपयोग करने की अनुमति दी गई थी। लेकिन चंडीगढ़ प्रशासन को इस आधार पर गंभीर सार्वजनिक विरोध का सामना करना पड़ा था। विरोध करने वालों का तर्क था कि इस तरह की प्रथा शहर के चरित्र को पूरी तरह से बदल देगी। मौजूदा बुनियादी ढांचे और सुविधाओं को खत्म कर देगी। नतीजतन नियमों को अक्टूबर 2007 में एक अधिसूचना द्वारा रद्द कर दिया गया था।
हालांकि अपीलकर्ता रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन ने दावा किया था कि प्रशासन ने आवासीय इकाइयों को चुपके से अपार्टमेंट में परिवर्तित करने के लिए आंखें मूंद लीं भले ही उक्त नियमों को वापस ले लिया गया हो। यह आरोप लगाया गया था कि प्रतिबंध होने के बावजूद बिल्डर और डेवलपर्स नियमित रूप से तीन व्यक्तियों या परिवारों को पूरी आवासीय इकाइयों के स्वतंत्र फ्लोर एरिया रेशियो बेचते हैं।
