इन्दौर । जीवन में हमारी आत्मा और चेतन को जितना जानने का प्रयास किया जाएगा जीवन में उतना ही आनंद आएगा। मन एक प्रोजेक्टर है जो पर्दे पर केवल इंद्रियों के चित्र दिखाता है। मनुष्य शरीर को ही सब कुछ मान कर उसके सौंदर्य में ही लगा है अत: के सौंदर्य की ओर उसका ध्यान ही नहीं जाता।
उक्त विचार दलालबाग में आयोजित चातुर्मास के दौरान संत शिरोमणी आचार्य विद्यासागर महामुनि राज की परम् शिष्या परम पूज्य 105 स्वर कोकिला आर्यिका पूर्णमति माता ने उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं को सबोधित करते हुए व्यक्त किए। आदिनाथ दिगंबर जैन धार्मिक एवं पारमार्थिक ट्रस्ट छत्रपति नगर एवं चातुर्मास संयोजक विपुल बांझल, सचिन सुपारी ने बताया कि चातुर्मास में नियमित प्रवचनों की अमृत श्रृंखला में आर्यिका पूर्णमति माताजी ने आगे कहा कि आत्मा की चर्चा में जब हम लीन हो जाते हैं तब सब कुछ भूल जाते हैं, जिसकी चर्चा में इतना आनंद है तो उसकी जब हम अनुभूति करेंगे तो कितना आनंद प्राप्त होगा। जीवन में हमें अपनी आत्मा की पहचान करनी है यही हमारा लक्ष्य होना चाहिए। संसार में अगर कुछ देखने योग्य है तो वह केवल निज आत्मा ही है लेकिन मनुष्य निज को छोड़ पर में अधिक ध्यान लगाए हैं। चातुर्मास संयोजक भूपेंद्र जैन एवं अमित वास्तु ने बताया कि आजादी के अमृत महोत्सव पर 15 अगस्त को ‘आत्मा की स्वतंत्रता’ पर पूर्णमति माताजी के प्रवचन दोपहर में होंगे।
