संजय अग्रवाल
इंदौर शहर आज पूरे देश में नागरिक चेतना और कचरा प्रबंधन का सबसे बेहतरीन उदाहरण है। स्वच्छ सर्वेक्षण में लगातार शीर्ष स्थान हासिल करना निस्संदेह नगर निगम, जनप्रतिनिधियों और जागरूक नागरिकों के साझा प्रयासों का परिणाम है। इस बड़ी उपलब्धि ने वैश्विक पटल पर शहर का मान बढ़ाया है। परंतु, जैसे ही मानसून की दस्तक होती है या हल्की बारिश भी होती है, शहर की रफ्तार पर अचानक ब्रेक लग जाता है। प्रमुख चौराहे, व्यस्त व्यापारिक मार्ग और अंडरपास पानी से घिर जाते हैं और देखते ही देखते पूरा शहर भीषण जाम की चपेट में आ जाता है।
घंटों रेंगते वाहन, फंसे हुए लोग और प्रभावित होतीं आपातकालीन सेवाएं एक बड़ा विरोधाभास खड़ा करती हैं। यह स्थिति इस गंभीर सवाल को जन्म देती है कि जो शहर स्वच्छता के मामले में देश का नेतृत्व कर रहा है, वह सुगम यातायात और जल निकासी के मोर्चे पर इतना असहाय क्यों नजर आता है?
समस्या के मूल कारण: एक व्यापक दृष्टिकोण
इंदौर की इस मौसमी समस्या का कोई एक कारण नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक और ढांचागत कमियों का मिलाजुला परिणाम है:
अतिक्रमण और अवरुद्ध ड्रेनेज: शहर के कई मुख्य मार्गों और फुटपाथों पर अस्थायी व स्थायी अतिक्रमण के कारण सड़कों की प्रभावी चौड़ाई कम हो गई है। सबसे गंभीर स्थिति यह है कि कई स्थानों पर ‘स्टॉर्म वाटर ड्रेनेज’ (वर्षा जल निकासी नाले) इस अतिक्रमण की वजह से ब्लॉक हो चुके हैं। प्रशासन द्वारा की जाने वाली तात्कालिक कार्रवाइयां इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं दे पाई हैं।
वाहनों की अनियंत्रित वृद्धि: एक प्रमुख शैक्षिक और व्यावसायिक केंद्र होने के कारण इंदौर में जनसंख्या और वाहनों का दबाव तेजी से बढ़ा है। कारों और दोपहिया वाहनों का पंजीकरण लगातार बढ़ रहा है, लेकिन सड़कों की क्षमता और नेटवर्क का विस्तार उस अनुपात में नहीं हो पाया है।
ढांचागत सीमाएं: बारिश के दौरान सड़कों पर पानी जमा होना ड्रेनेज सिस्टम की विफलता को दर्शाता है। मानसून से पूर्व नालों की सफाई और गाद निकालने (डीसिल्टिंग) के दावों के बावजूद धरातल पर पानी की निकासी सुचारू नहीं हो पाती। गड्ढे और असमान सड़कें इस संकट को और बढ़ा देती हैं।
यातायात प्रबंधन और नागरिक अनुशासन: पीक आवर्स या बारिश के समय सड़कों पर यातायात पुलिस की रणनीतिक तैनाती और रूट डायवर्सन की कमी खलती है। साथ ही, गलत दिशा में वाहन चलाना, नो-पार्किंग में गाड़ियां खड़ी करना और यातायात नियमों की अनदेखी जैसी नागरिक लापरवाही भी इस जाम को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाती है।
जवाबदेही और सुधार की आवश्यकता
एक आदर्श शहरी मॉडल वही है जहां नागरिक सुविधाएं सुचारू रूप से कार्य करें।
नगर पालिक निगम: स्वच्छता की तरह ही नगर निगम को जल निकासी (ड्रेनेज) और सड़क सुदृढ़ीकरण को अपनी प्राथमिकता सूची में शीर्ष पर रखना होगा। केवल कचरा मुक्त होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि जलजमाव से मुक्ति भी ‘स्मार्ट सिटी’ का अनिवार्य पैमाना है।
यातायात पुलिस और प्रशासन: नियम तोड़ने वालों पर सख्त कार्रवाई, आधुनिक तकनीकी (जैसे इंटेलिजेंट ट्रैफिक मैनेजमेंट सिस्टम) का प्रभावी उपयोग और आपातकालीन स्थितियों के लिए पहले से तैयार ‘विपरीत मौसम कार्ययोजना’ बेहद जरूरी है।
दीर्घकालिक शहरी नियोजन: राज्य सरकार और नगर नियोजन विभाग को अगले २० वर्षों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए फ्लाईओवर, चौड़ीकरण और पब्लिक ट्रांसपोर्ट (जैसे बीआरटीएस और बस नेटवर्क) को और अधिक सुदृढ़ बनाने पर ध्यान केंद्रित करना होगा।
आगे की राह और सुझाव
इंदौर को इस समस्या से उबारने के लिए तात्कालिक और दीर्घकालिक दोनों स्तरों पर ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है:
हॉकर्स जोन का निर्माण: सड़कों से अतिक्रमण हटाने के साथ-साथ छोटे व्यवसायियों के लिए व्यवस्थित ‘वेंडिंग या हॉकर्स जोन’ बनाए जाएं, जिससे उनका रोजगार भी सुरक्षित रहे और सड़कें भी खाली रहें।
ड्रेनेज का मास्टर प्लान: पूरे शहर के स्टॉर्म वाटर नेटवर्क का वैज्ञानिक ऑडिट होना चाहिए ताकि बारिश के पानी का बिना किसी रुकावट के प्राकृतिक जलस्रोतों में निकास हो सके।
नागरिक सहभागिता: जिस प्रकार इंदौर के निवासियों ने कचरा न फेंकने को अपनी आदत बना लिया है, उसी प्रकार यातायात नियमों का पालन करने और सार्वजनिक अनुशासन को भी एक जन-आंदोलन का रूप देना होगा।
इंदौर के नागरिक टैक्स देते हैं और एक बेहतर जीवन स्तर के हकदार हैं। यातायात का यह संकट केवल समय की बर्बादी नहीं है, बल्कि यह शहर की आर्थिक गतिशीलता को भी चोट पहुंचाता है। प्रशासन और नागरिक समाज को मिलकर इस दिशा में काम करना होगा। जब तक हम हल्की बारिश में भी नागरिकों को सुगम रास्ते देने में सक्षम नहीं होते, तब तक देश में ‘नंबर वन’ होने का हमारा गौरव अधूरा ही रहेगा। अब समय आ गया है कि दावों से आगे बढ़कर धरातल पर ठोस सुधार दिखाई दें।
(लेखक वर्ल्ड हिंदू फेडरेशन मध्यप्रदेश के अध्यक्ष हैं। )
