फिल्म समीक्षक: डॉक्टर महेन्द्र यादव

निर्देशक: इम्तियाज़ अली
लेखन: इम्तियाज़ अली एवं नयनिका माहतानी
पटकथा: इम्तियाज़ अली, नयनिका माहतानी
संगीत: ए. आर. रहमान
गीत: इरशाद कामिल
मुख्य कलाकार: नसीरुद्दीन शाह, दिलजीत दोसांझ, वेदांग रैना, शरवरी वाघ, मनीष चौधरी।
“मैं वापस आऊँगा” ऐसे दौर में आई है, जब सिनेमाघरों पर शोर, गति और त्वरित मनोरंजन का वर्चस्व है। ऐसे समय में इम्तियाज़ अली ने एक ऐसी फ़िल्म बनाई है जो दर्शक से धैर्य, संवेदना और आत्मीय सहभागिता की माँग करती है। यह फ़िल्म देखी नहीं जाती, महसूस की जाती है; समाप्त नहीं होती, भीतर लंबे समय तक गूँजती रहती है।
भारत-पाकिस्तान विभाजन की पृष्ठभूमि पर बुनी गई यह कथा दरअसल इतिहास का पुनर्पाठ नहीं, बल्कि स्मृतियों में अटकी एक अधूरी प्रेम-कहानी की अंतिम धड़कन है। यह किसी पारंपरिक कथा की तरह घटनाओं से नहीं, भावनाओं से आगे बढ़ती है। इसकी गति किसी ग़ज़ल के मतले जैसी है—धीमी, ठहरी हुई और भीतर तक उतर जाने वाली।
फ़िल्म का सबसे विराट स्तंभ 95 वर्षीय सरदार केशर सिंह ग्रेवाल के रूप में नसीरुद्दीन शाह का अभिनय है। वर्षों के अनुभव के बाद भी वे यहाँ स्वयं को पीछे छोड़ देते हैं। उनकी आँखें, चेहरे की झुर्रियाँ, काँपती साँसें और लंबी चुप्पियाँ संवादों से कहीं अधिक मुखर हो जाती हैं। यह अभिनय नहीं, मानो स्मृतियों का जीवंत दस्तावेज़ है। यदि उनके पूरे अभिनय-जीवन में किसी एक भूमिका को शिखर कहा जाए तो “मैं वापस आऊँगा” उसका सबसे प्रबल दावेदार प्रतीत होती है। उनकी हर अभिव्यक्ति मृत्यु के निकट खड़े उस व्यक्ति की है, जिसे जीवन से नहीं, केवल एक अधूरे अलविदा से शिकायत है।
युवा केशर (कीनू) के रूप में वेदांग रैना और जिया के रूप में शरवरी वाघ मासूम प्रेम को बड़ी सादगी से जीते हैं। दोनों के बीच का संबंध किसी फ़िल्मी रोमांस का प्रदर्शन नहीं, बल्कि अनकहे भावों का संगीत है। दूसरी ओर दिलजीत दोसांझ ने एनआरआई पोते निरबेर के किरदार में संयमित और आत्मीय अभिनय किया है। उनका पात्र केवल अपने दादा की अधूरी प्रेम-कथा को पूरा करने नहीं निकलता, बल्कि अपनी जड़ों और अपनी पहचान की खोज भी करता है।
इम्तियाज़ अली ने विभाजन की हिंसा को सनसनी के रूप में नहीं, बल्कि मनुष्यता पर लगे गहरे घाव के रूप में चित्रित किया है। दंगे, लाशें और सरहदें अंततः पृष्ठभूमि में चली जाती हैं; सामने रह जाता है केवल प्रेम—जो समय, दूरी और मृत्यु से भी बड़ा सिद्ध होता है।
ए. आर. रहमान का संगीत इस फ़िल्म की आत्मा है। यहाँ संगीत फुलझड़ी की चमक नहीं, बल्कि धीरे-धीरे जलती अगरबत्ती की सुगंध है, जो दृश्य समाप्त होने के बाद भी वातावरण में बनी रहती है। इरशाद कामिल के गीत और शायरी कथा को शब्द नहीं, आत्मा प्रदान करते हैं।
छायांकन का प्रत्येक फ़्रेम चित्रकला जैसा सधा हुआ है। कैमरा केवल दृश्य नहीं दिखाता, स्मृतियों को दर्ज करता है। फ़िल्म का कला-निर्देशन, वेशभूषा और ध्वनि-डिज़ाइन मिलकर 1940 के दशक के पंजाब को विश्वसनीयता के साथ पुनर्जीवित करते हैं।
विभाजन पर बनी महान कृतियों—तमस, गर्म हवा, पिंजर, 1947 अर्थ, ए ट्रेन टू पाकिस्तान, वीर-ज़ारा और सीता रामम—की परंपरा में “मैं वापस आऊँगा” एक विशिष्ट स्थान अर्जित करती है। यदि गोविंद निहलानी का तमस विभाजन का सबसे प्रामाणिक सामाजिक आख्यान है, तो इम्तियाज़ अली की यह फ़िल्म विभाजन की सबसे करुण प्रेम-कथाओं में अवश्य गिनी जाएगी।
यह फ़िल्म उन दर्शकों के लिए नहीं है जो हर पाँच मिनट में रोमांच खोजते हैं। यह उन लोगों के लिए है जो सिनेमा में कविता, संगीत में ख़ामोशी और अभिनय में आँखों की भाषा पढ़ना जानते हैं।
संभव है कि यह फ़िल्म बॉक्स ऑफिस पर चमत्कारी सफलता न पाए, लेकिन इतिहास बताता है कि “प्यासा” और “काग़ज़ के फूल” जैसी फ़िल्मों का वास्तविक मूल्य समय ने ही निर्धारित किया था। “मैं वापस आऊँगा” भी उसी श्रेणी की फ़िल्म प्रतीत होती है—जो आज नहीं तो आने वाले वर्षों में अपनी असली पहचान प्राप्त करेगी।
रेटिंग: ★★★★½ (4.5/5)
अंत में…
«मैं वापस आऊँगा,
किसी अधूरी ग़ज़ल के मिसरे की मानिंद,
फटे काग़ज़ की नज़्म के कोने की तरह।
सरहद ने बाँटा था जिस्मों को,
रूहें आज भी सरगोधा की गलियों में भटकती हैं।
मैं वापस आऊँगा,
एक अटकी हुई साँस के सहारे,
अपनी टूटी पुरानी साइकिल लेकर,
सिर्फ़ इतना कहने—
“अलविदा… अब मैं सचमुच लौट सकता हूँ।”»
