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संस्कारों का आईना और हमारी दोहरी मानसिकता
आज अचानक देश के एक वर्ग को भाषा की शुचिता, संस्कारों की मर्यादा और सभ्यता के मानक याद आने लगे हैं। सोशल मीडिया पर नई पीढ़ी की भाषा को लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है। कहा जा रहा है कि आज का युवा असभ्य, उद्दंड और मर्यादाहीन हो गया है। प्रश्न यह है कि क्या यह चिंता वास्तव में भाषा के पतन की है, या फिर उस सामाजिक दोगलेपन की, जिसे नई पीढ़ी ने बेझिझक उजागर कर दिया है?
सच तो यह है कि भाषा कभी अकेले पैदा नहीं होती। वह समाज की गोद में पलती है, परिवार के वातावरण में आकार लेती है और सार्वजनिक जीवन से अपना संस्कार ग्रहण करती है। यदि आज युवा कठोर, आक्रामक या असभ्य शब्दों का प्रयोग कर रहा है, तो उसके बीज किसने बोए? क्या कोई माता-पिता अपने बच्चे को गाली देना सिखाते हैं? नहीं। बच्चा वही सीखता है जो वह घर, सड़क, मीडिया, राजनीति और डिजिटल संसार में प्रतिदिन सुनता और देखता है।
विडंबना यह है कि वही समाज, जिसने वर्षों तक फिल्मों, वेब सीरीज़, स्टैंड-अप कॉमेडी और सोशल मीडिया पर अपशब्दों से भरे मनोरंजन को लोकप्रिय बनाया, आज उसी भाषा पर नैतिकता का व्याख्यान दे रहा है। जब अभद्र संवाद मनोरंजन का माध्यम बने, तब किसी ने प्रश्न नहीं उठाया। जब राजनीतिक मंचों, टीवी बहसों और सोशल मीडिया पर मर्यादाएँ टूटीं, तब संस्कारों के प्रहरी मौन रहे। लेकिन जैसे ही नई पीढ़ी ने उसी भाषा में अपनी नाराज़गी और असहमति व्यक्त की, अचानक संस्कार संकट में दिखाई देने लगे।
यह किसी भी प्रकार से गाली-गलौज का समर्थन नहीं है। भाषा जितनी संयमित होगी, समाज उतना ही सभ्य बनेगा। किंतु न्याय का तकाज़ा यह भी है कि दोष केवल अंतिम पीढ़ी पर न मढ़ा जाए। यदि वृक्ष के फल कड़वे हैं, तो जड़ों की भी समीक्षा आवश्यक है।
एक और प्रश्न हमें भीतर तक झकझोरता है। हमारी अधिकांश गालियाँ स्त्री की गरिमा, उसके अस्तित्व और उसके सम्मान को क्यों लक्ष्य बनाती हैं? यह शब्दावली किसने गढ़ी? किसने इसे सामान्य व्यवहार का हिस्सा बनाया? और तब समाज के तथाकथित संस्कार-रक्षक कहाँ थे? यदि वास्तव में संस्कार बचाने हैं, तो सबसे पहले भाषा से स्त्री-विरोधी मानसिकता को हटाना होगा।
आज कुछ लोग इस बात से अधिक विचलित हैं कि लड़कियाँ भी उसी भाषा का प्रयोग क्यों कर रही हैं। क्या अभद्र भाषा का अधिकार केवल पुरुषों के लिए सुरक्षित है? यदि गाली गलत है, तो वह हर किसी के लिए गलत है। यदि मर्यादा आवश्यक है, तो वह सब पर समान रूप से लागू होनी चाहिए। संस्कार कभी लिंग देखकर नहीं बाँटे जाते।
नई पीढ़ी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह मुखौटों से कम और वास्तविकता से अधिक परिचित है। वह दिखावे से अधिक पारदर्शिता में विश्वास करती है। यह पीढ़ी गलतियाँ करती है, लेकिन कम से कम अपने वास्तविक चेहरे के साथ खड़ी होती है। हमें उसकी भाषा पर ही नहीं, उसके आक्रोश के कारणों पर भी विचार करना चाहिए।
हमने ही बच्चों के हाथ में मोबाइल दिया, इंटरनेट उपलब्ध कराया, डिजिटल दुनिया के द्वार खोले, उन्हें कंटेंट क्रिएटर बनने के लिए प्रोत्साहित किया और उसी डिजिटल संस्कृति को सफल बनाया जिसमें सनसनी, विवाद और आक्रामकता सबसे अधिक बिकती रही। यदि आज वही पीढ़ी उसी संस्कृति का प्रतिबिंब बनकर हमारे सामने खड़ी है, तो केवल उसे दोषी ठहराना आत्ममुग्धता होगी।
सच तो यह है कि आने वाली पीढ़ियाँ हमारी बनाई हुई दुनिया का ही विस्तार होती हैं। वे हमारे शब्द, हमारे संस्कार, हमारी आदतें और हमारे विरोधाभास विरासत में लेकर आगे बढ़ती हैं। इसलिए यदि समाज को बदलना है, तो शुरुआत स्वयं से करनी होगी। बच्चों को दोष देने से पहले बड़ों को अपना आत्ममंथन करना होगा।
संस्कार उपदेश से नहीं, उदाहरण से जन्म लेते हैं। यदि हमारे शब्दों में शालीनता होगी, व्यवहार में सम्मान होगा और सार्वजनिक जीवन में मर्यादा होगी, तो अगली पीढ़ी भी उसी संस्कृति को अपनाएगी। अन्यथा दोहरे मापदंड केवल अविश्वास पैदा करेंगे।
अंततः प्रश्न यह नहीं कि युवा क्या बोल रहे हैं। असली प्रश्न यह है कि हमने उन्हें सुनने, समझने और सही दिशा देने के लिए क्या किया? समाज का भविष्य केवल बच्चों की भाषा से नहीं, बड़ों के चरित्र से तय होता है।
डॉ. महेन्द्र यादव
