पश्चिम बंगाल में हाल ही में हुए ऐतिहासिक परिवर्तन ने पूरे देश के हिंदू समाज और राष्ट्रभक्तों के हृदय में नई आशा जगा दी है। ममता बनर्जी के लंबे शासनकाल में राज्य की पहचान को अलग-थलग करने वाले “बिस्वा बांग्ला” लोगो को नए मुख्यमंत्री श्री शुभेंदु अधिकारी जी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने हटा दिया है। अब सरकारी वेबसाइटों, दस्तावेजों और सार्वजनिक स्थानों पर भारत के राष्ट्रीय प्रतीक **अशोक स्तंभ** (Lion Capital of Ashoka) स्थापित हो गया है। यह मात्र एक लोगो परिवर्तन नहीं, बल्कि बंगाल को उसके सनातन भारतीय संस्कृति की जड़ों से जोड़ने का प्रतीकात्मक कदम है।
“बिस्वा बांग्ला” — अलगाववाद की पहचान
2011 में सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी ने “बिस्वा बांग्ला” ब्रांडिंग को राज्य की आधिकारिक पहचान बना दिया। 2018 के आसपास यह लोगो पूरे सरकारी तंत्र में फैल गया — स्कूल यूनिफॉर्म, सरकारी पत्र, वेबसाइट, मेला ग्राउंड (बिस्वा बांग्ला मेला प्रांगण) तक। इसमें एक विशेष ‘ब’ अक्षर प्रमुखता से दिखता था, जो बंगाली अलगाववाद को बढ़ावा देने वाला प्रतीत होता था। इस ब्रांडिंग ने बंगाल को “विश्व बांग्ला” के रूप में प्रस्तुत किया, लेकिन भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों को पीछे धकेल दिया।
यह बदलाव संयोग नहीं था। तृणमूल कांग्रेस के शासन में हिंदू त्योहारों पर प्रतिबंध, मंदिरों पर हमले, लव जिहाद, घुसपैठियों को संरक्षण और “बंगाली अस्मिता” के नाम पर सांप्रदायिक तुष्टीकरण की नीति अपनाई गई। “बिस्वा बांग्ला” लोगो इसी विचारधारा का प्रतीक बन गया — जो भारत की एकता को चुनौती देता था और क्षेत्रीय अलगाव को बढ़ावा देता था।
अशोक स्तंभ की वापसी: राष्ट्रीय एकता का संदेश
शुभेंदु अधिकारी जी की सरकार ने सत्ता संभालते ही “एगिये बांग्ला” पोर्टल पर बिस्वा बांग्ला लोगो हटाकर अशोक स्तंभ और “सत्यमेव जयते” स्थापित कर दिया। मिलन मेला टावर पर भी राष्ट्रीय ध्वज के रंग और अशोक प्रतीक दिखाई देने लगे। यह कदम बंगाल को भारत माता की गोद में लौटाने का है।
**अशोक स्तंभ** क्या है?
यह सम्राट अशोक का सारनाथ स्तंभ है, जिसमें चार सिंह एक-दूसरे की पीठ पर खड़े हैं — शक्ति, साहस, एकता और धर्म की रक्षा का प्रतीक। भारत सरकार का राष्ट्रीय चिह्न। “सत्यमेव जयते” मुंडकोपनिषद् से लिया गया मंत्र। यह प्रतीक हमें याद दिलाता है कि बंगाल कभी अलग नहीं था — यह गौड़-बंगाल के रूप में सनातन संस्कृति का केंद्र रहा है। चैतन्य महाप्रभु, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, रवींद्रनाथ टैगोर और नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे महापुरुषों की भूमि।
यह परिवर्तन “एक राष्ट्र, एक प्रतीक” की भावना को मजबूत करता है। कई अन्य राज्यों की तरह अब बंगाल भी राष्ट्रीय एकता का हिस्सा बनेगा, न कि अलगाव का।
हिंदू समाज के लिए संदेश
वर्ल्ड हिंदू फेडरेशन (WHF) के रूप में हम इस बदलाव का स्वागत करते हैं। यह बंगाल के हिंदुओं के लिए राहत की सांस है, जिन्हें पिछले वर्षों में अत्याचारों का सामना करना पड़ा। मंदिरों की सुरक्षा, हिंदू त्योहारों का निर्बाध आयोजन, और सांस्कृतिक पुनरुत्थान अब संभव होगा।
– **सांस्कृतिक पुनर्जागरण**: दुर्गा पूजा, काली पूजा जैसी परंपराओं को राजनीतिक दबाव से मुक्ति मिलेगी।
– **राष्ट्रीय एकीकरण**: बंगाल अब “भारत माता की जय” के साथ आगे बढ़ेगा, न कि क्षेत्रीय नारों के साथ।
– **विकास की नई दिशा**: तुष्टीकरण की नीति छोड़कर समावेशी विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पर फोकस।
यह बदलाव मात्र प्रतीकात्मक नहीं है। यह बंगाल की जनता की आकांक्षा है — जो 2026 के चुनाव में साफ दिखी। शुभेंदु जी जैसे साहसी नेता ने हिंदू हितों की रक्षा और राष्ट्रवाद को प्राथमिकता दी।
बंगाल में अशोक स्तंभ की वापसी पूरे भारत के लिए प्रेरणा है। यह साबित करता है कि सनातन संस्कृति की जड़ें कभी नहीं सूखतीं। वर्ल्ड हिंदू फेडरेशन मध्य प्रदेश इकाई इस ऐतिहासिक कदम का अभिनंदन करती है और पूरे देश के हिंदू भाइयों-बहनों से अपील करती है — हम सब एक हैं, हमारा प्रतीक एक है, हमारी माता एक है।
(लेखक संजय अग्रवाल वर्ल्ड हिंदू फेडरेशन मध्यप्रदेश के अध्यक्ष हैं।)