अब यह वाक्य देश की नई पहचान बन चुका है। पहले लोग परिचय देते थे – “मैं डॉक्टर हूँ”, “मैं इंजीनियर हूँ”, “मैं सरकारी नौकरी में हूँ”… अब बस इतना कहना काफी है – “अरे वही… लल्लन टॉप वाले!”
और सामने वाला तुरंत श्रद्धा, जिज्ञासा और हल्की मुस्कान के साथ सिर हिला देता है, जैसे किसी डिजिटल युग के तुलसीदास का नाम सुन लिया हो।
मामला बड़ा संवेदनशील है।
क्योंकि देश में दो तरह के लोग होते हैं।पहले वो, जो कैमरे के सामने आते ही पसीना-पसीना हो जाते हैं।दूसरे वो, जो कैमरे को देखकर ऐसे खिल जाते हैं जैसे शादी में मौसी का बेटा DJ पर “लौंडे बदनाम हुए” सुनते ही खिल उठता है।
सौरभ भाई दूसरी कैटेगरी के शिखर पुरुष हैं।
अब देखिए, पत्रकारिता और एक्टिंग में फर्क वही है जो रेलवे प्लेटफॉर्म की चाय और स्टारबक्स की कॉफी में होता है।
दोनों पीने की चीज़ हैं… पर एक में आदमी सफर काटता है, दूसरी में EMI।
पत्रकार जब सवाल पूछता है तो उसकी आँखों में खोज होती है।
एक्टर जब डायलॉग बोलता है तो उसकी आँखों में खोज कम और कॉन्टैक्ट लेंस ज्यादा होता है।
यहीं खेल गड़बड़ा गया।
मुझे पूरा शक है कि वर्षों तक इंटरव्यू लेते-लेते सौरभ भाई के भीतर का कलाकार अंगड़ाई लेने लगा होगा।
जब कोई आदमी रोज़ आमिर खान, मनोज बाजपेयी, पंकज त्रिपाठी और नवाज़ुद्दीन से बात करेगा तो एक दिन उसे भी लगेगा –
“यार… ये लोग ऐसा क्या कर लेते हैं? हम भी दो-चार डायलॉग ठोक ही देंगे।”
और यही वो ऐतिहासिक क्षण रहा होगा जब ब्रह्मांड ने कहा होगा –
“तथास्तु… अब भुगतो।”
कहते हैं शूटिंग शुरू होने से पहले डायरेक्टर ने पूछा होगा –
“सौरभ जी, आपको किस तरह का रोल चाहिए?”
तो भीतर का कलाकार बोला होगा –
“कुछ ऐसा… जिसमें गंभीरता भी हो, रहस्य भी हो, और जनता बोले – अरे वाह!”
डायरेक्टर ने मन ही मन कहा होगा –
“जनता ‘वाह’ तो जरूर बोलेगी… पर किस भावना में बोलेगी, ये हम नहीं बताएँगे।”
और फिर जो हुआ, वो भारतीय OTT इतिहास का सबसे साहसी सामाजिक प्रयोग था।
सौरभ भाई स्क्रीन पर आते हैं।
बालों में इतना जेल लगा है कि अगर बिजली चली जाए तो आदमी सिर रगड़कर ट्यूबलाइट जला ले।
चेहरे पर ऐसी मुस्कान जैसे बच्चा पहली बार स्कूल में मॉनिटर बना हो।
और डायलॉग ऐसे फेंक रहे हैं जैसे प्राइम टाइम डिबेट में आंकड़े फेंकते थे।
लेकिन जनता बड़ी निर्दयी है।
उसे पर्दे के पीछे की पीड़ा नहीं दिखती।
उसे ये नहीं दिखता कि आदमी वर्षों तक नेताओं से “सर एक आखिरी सवाल…” पूछते-पूछते आखिरकार खुद “एक आखिरी टेक…” तक पहुंचा है।
लोग कह रहे हैं एक्टिंग खराब है।
अरे भैया, खराब एक्टिंग नहीं है… ये पत्रकारिता का साइड इफेक्ट है।
आप गौर कीजिए —
साधारण एक्टर सीन में घुसता है।
सौरभ भाई सीन को ऐसे देखते हैं जैसे अभी बोल देंगे —
“लेकिन इससे बड़ा सवाल ये उठता है कि आखिर घी किसने खाया?”
उनकी बॉडी लैंग्वेज में अभी भी एंकरिंग की आत्मा जीवित है।
ऐसा लगता है किसी भी क्षण कैमरे की तरफ मुड़कर कह देंगे —
“बाकी खबरों के लिए देखते रहिए…”
और असली त्रासदी तो अनुभवी कलाकारों की रही होगी।
संजय कपूर जैसे लोग 35 साल से एक्टिंग कर रहे हैं।
उन्होंने न जाने कितने नए कलाकार देखे होंगे।
पर पहली बार किसी को डायलॉग के बीच में ऐसा भाव देते देखा होगा जैसे अभी फैक्ट चेक निकाल देंगे।
रीटेक पर रीटेक हो रहे होंगे।
डायरेक्टर चिल्लाता होगा — “कट!”
और सौरभ भाई पूछते होंगे —
“कट क्यों? डेटा तो सही था।”
लेकिन मैं इस पूरे मामले में सौरभ भाई के साथ खड़ा हूँ।
क्योंकि सपने देखने का टैक्स अभी इस देश में नहीं लगा है।
अगर एक क्रिकेटर राजनीति में जा सकता है,
राजनेता पॉडकास्ट कर सकता है,
इन्फ्लुएंसर रैप सॉन्ग निकाल सकता है,
तो पत्रकार एक्टिंग क्यों नहीं कर सकता?
हाँ, जनता को थोड़ा मानसिक रूप से तैयार जरूर करना चाहिए था।
सीधे ट्रेलर देखकर कई लोग ऐसे चौंके जैसे दाल मखनी में किशमिश निकल आई हो।
मगर याद रखिए — हर महान कलाकार के करियर में एक ऐसा दौर आता है, जिसे बाद में लोग “एक्सपेरिमेंटल फेज़” कहकर माफ कर देते हैं।
इसलिए आने वाले समय में जब फिल्म संस्थानों में “ओवरकॉन्फिडेंस और कैमरा प्रेजेंस” पर रिसर्च होगी, तब एक अध्याय जरूर पढ़ाया जाएगा —