डॉक्टर महेन्द्र यादव की पाती थोड़ी जज्बाती 
उज्जैन केवल मंदिरों, तीर्थों और आध्यात्मिक आभा का नगर नहीं, बल्कि यह साहित्य, कला, संस्कृति और व्यंग्य चेतना की जीवंत धरती भी है। इस शहर की सांस्कृतिक पहचान को यदि कुछ पारंपरिक आयोजनों ने स्थायित्व दिया है, तो उनमें अखिल भारतीय टेपा सम्मेलन, अंतर्राष्ट्रीय ठहाका सम्मेलन और भैराजी सम्मान का नाम अत्यंत आदर के साथ लिया जाता है। ये केवल आयोजन नहीं, बल्कि उज्जैन की सांस्कृतिक आत्मा के उत्सव हैं—ऐसे उत्सव, जिन्होंने पीढ़ियों को जोड़ा, रचनात्मकता को मंच दिया और परंपरा को जीवित रखा।
1971 में डॉ. शिव शर्मा ने हास्य-व्यंग्य की जिस विलक्षण परंपरा का सूत्रपात टेपा सम्मेलन के रूप में किया, वह समय के साथ एक संस्था बन गई। इसी परंपरा की अगली कड़ी के रूप में सन 2001 में अंतर्राष्ट्रीय ठहाका सम्मेलन की स्थापना हुई, जिसने हास्य-व्यंग्य की इस चेतना को एक नया विस्तार दिया। लेखक के रूप में मुझे जब डॉ. शिव शर्मा का आशीर्वाद मिला, तब उन्होंने केवल स्नेह ही नहीं दिया, बल्कि अपनी पूरी टेपा टीम—पिलकेंद्र अरोरा,पद्मजा रघुवंशी, अशोक भाटी, दिनेश दिग्गज, हरीश पोद्दार, ग़यूर कुरैशी सहित—ठहाका सम्मेलन से जोड़ दी। यह साथ केवल औपचारिक नहीं था, बल्कि एक परंपरा का दूसरी परंपरा को सौंपा गया विश्वास था।
और फिर भला डॉ. हरीश कुमार सिंह कैसे पीछे रहते! वे भी इसी आत्मीयता और समर्पण के साथ ठहाका सम्मेलन की टीम में शामिल हुए। तभी से लेकर आज तक, ठहाका सम्मेलन की पूरी रूपरेखा, वैचारिक तैयारी और आयोजन की भूमिका में वे हर कदम पर साथ खड़े रहे हैं। आज मेरे गुरु डॉ. शिव शर्मा भले ही इस दुनिया में नहीं हैं, किंतु डॉ. हरीश कुमार सिंह उसी जज़्बे, उसी प्रतिबद्धता और उसी आत्मीय निष्ठा के साथ इस परंपरा के सहयात्री बने हुए हैं।
इसी प्रकार कैलाश वर्मा ने लगभग 39 वर्ष पूर्व भैराजी सम्मान के माध्यम से मालवी लोकसंस्कृति, लोकसंगीत और कला के संरक्षण का जो बीज बोया, वह आज एक विशाल वटवृक्ष के रूप में प्रतिष्ठित है।
समय के प्रवाह में डॉ. शिव शर्मा और कैलाश वर्मा भले ही भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं रहे, किंतु उनके द्वारा रोपी गई सांस्कृतिक परंपराएँ आज भी उतनी ही जीवंत, सक्रिय और प्रभावशाली हैं। यह अपने आप नहीं हुआ। इसके पीछे कुछ ऐसे समर्पित व्यक्तित्व हैं, जिन्होंने इन आयोजनों को केवल आगे नहीं बढ़ाया, बल्कि उनकी गरिमा, गुणवत्ता और आत्मा को अक्षुण्ण बनाए रखा।
ऐसे ही व्यक्तित्व हैं—डॉ. हरीश कुमार सिंह।
डॉ. हरीश कुमार सिंह उस अदृश्य लेकिन निर्णायक शक्ति का नाम हैं, जो मंच के प्रकाश से दूर रहकर भी पूरे आयोजन की ऊर्जा, अनुशासन और दिशा का केंद्र बने रहते हैं। वे उन विरल लोगों में हैं, जो परंपरा को केवल स्मृति में नहीं, कर्म में जीते हैं।
आज मनीष शर्मा, डॉ. शिव शर्मा की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं, और जयेश वर्मा, कैलाश वर्मा की सांस्कृतिक विरासत को सफलतापूर्वक संभाल रहे हैं। किंतु इन दोनों आयोजनों के पीछे एक ऐसा मार्गदर्शक, एक ऐसा संयोजक, एक ऐसा संरक्षक खड़ा है, जिसने निस्वार्थ भाव से दोनों आयोजनों में अध्यक्ष की भूमिका निभाते हुए उन्हें निरंतरता और विश्वसनीयता प्रदान की है—वह नाम है डॉ. हरीश कुमार सिंह।
उनका योगदान केवल प्रशासनिक या औपचारिक नहीं है। वे इन आयोजनों की आत्मा से जुड़े हुए व्यक्ति हैं। आयोजन की अवधारणा से लेकर उसकी गरिमा, प्रतिभागियों के चयन से लेकर मंच की प्रतिष्ठा तक—हर स्तर पर उनकी दृष्टि और अनुभव दिखाई देता है।
डॉ. हरीश कुमार सिंह केवल आयोजक नहीं, स्वयं एक उत्कृष्ट व्यंग्यकार भी हैं। उनकी लेखनी में सामाजिक विसंगतियों पर प्रहार है, किंतु उसमें कटुता नहीं; विनोद है, किंतु हल्कापन नहीं; और सबसे बढ़कर, एक सजग रचनाकार की सामाजिक प्रतिबद्धता है। यही साहित्यिक चेतना उन्हें केवल आयोजन संचालक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संवाहक बनाती है।
ऐसे समय में, जब अनेक पारंपरिक आयोजन समय के साथ स्मृतियों में विलीन हो जाते हैं, तब टेपा सम्मेलन, ठहाका सम्मेलन और भैराजी सम्मान का अनवरत जारी रहना इस बात का प्रमाण है कि परंपराएँ केवल संस्थापकों के सहारे नहीं, बल्कि ऐसे समर्पित संरक्षकों के कारण जीवित रहती हैं।
डॉ. हरीश कुमार सिंह वास्तव में उन दुर्लभ व्यक्तित्वों में हैं, जो स्वयं पृष्ठभूमि में रहकर परंपरा को अग्रभूमि में बनाए रखते हैं। वे व्यक्ति नहीं, एक सेतु हैं—अतीत और वर्तमान के बीच; परंपरा और भविष्य के बीच।
उज्जैन की सांस्कृतिक धारा में यदि आज भी यह प्रवाह अविराम है, तो उसमें डॉ. हरीश कुमार सिंह जैसे व्यक्तित्वों का मौन, किंतु विराट योगदान अवश्य स्मरणीय है।
वास्तव में, वे केवल आयोजन की बागडोर नहीं संभाल रहे, बल्कि एक सांस्कृतिक विरासत की मशाल थामे हुए हैं।
