। ललित भाटी।।
क्या इस शाश्वत सत्य को अस्वीकृत किया जा सकता है कि, हिंदू और मुस्लिम सदियों से, इस अति विशाल देश की , अलग -अलग जातियों में विभाजित रहते हुए भी , एक दूसरे के पूरक रहते हुए, सुदृढ़ आधार स्तंभ हैं। इस देश में एकसाथ रहते भी , भले ही दोनों के बीच विचारों की कितनी ही मत विभिन्नता क्यों न हो, बावजूद इसके सच्चाई यही कहती है कि, तब भी रहना तो दोनों को ही एकसाथ होकर ही। और जब अंतिम रूप से सामूहिक होकर ही रहना है, तो फिर क्यों न अपने अपने दशकों से पनपते आ रहे कुछ जिदभरे आग्रहों को तिलांजलि देते हुए, उदारता और सहयोग की पुनीत भावना के साथ ही रहा जाए।
यह कहना बहुत ही सरल है कि, दोनों के ही मध्य में सौ प्रतिशत वैचारिक स्वीकृति एवं सहमति, कभी भी नहीं बन सकती है, बावजूद इसके जिन भी मुद्दों पर बन सकती हो, उन पर बनाकर, कुछ हद तक तो आपसी कटुता को कम किया जा सकता है। यह एक बात भी बिल्कुल सही है कि, दोनों के ही बीच धर्म, पंथ, पर्व, सम्प्रदाय आदि को लेकर अनेक भिन्नताएं हैं, लेकिन इस कटु सत्य को भी बड़े मन से स्वीकार करते हुए, आपस में स्नेहपूर्ण वातावरण की रचना की जा सकती है। और यदि ऐसा बेहतर करते हुए पावन, पवित्र, पुनीत की स्थापना हो जाती है, तो यह नवाचार मनुष्यता के कल्याण में अपनी मूल्यवान भूमिका अदा कर सकता है।
जब परिस्थितियां और वास्तविकता इस सनातन सच को घोषित करती रहे कि, आखिरकार दोनों के ही समुदाय इस देश की धड़कन के दो महत्त्वपूर्ण तार हैं, इसलिए दोनों को ही कुछ प्रमुख मामलों में उदारता बरतते हुए, अपने बीच के अनावश्यक टकराव पैदा करने वाली कुछ बातों तथा कारणों को अनदेखा करने की कोशिश करते रहना चाहिए। यदि दोनों ही पक्ष, इस मामले में , अपना बहुत बड़ा मन करते हुए परस्पर सामंजस्य स्थापित करेंगे, तो वह शुभ दिन आने में जरा भी देरी नहीं लगेगी, जबकि दोनों के बीच नाममात्र की ही खटास शेष रह जाएगी। कुल मिलाकर ऐसे सद प्रयासों को तेज़ी से अमल में लाते हुए, आत्मीयता का भाव रचा जा सकता है।
दोनों के ही बीच पिछले काफ़ी समय से आपस में सर्वाधिक हाहाकार मचता आ रहा है, ।। वंदे मातरम्।। को गाने को लेकर। पहली बात तो हम सभी के मध्य इस बात की स्वीकारोक्ति होनी चाहिए कि, किसी भी भारतीय व्यक्ति के इस गान को गाने या न गाने से वंदे मातरम् जैसी महान रचना की महिमा ज़रा भी कम नहीं हो सकती है। उसका जो पवित्र भाव है, वह प्रत्येक भारतीय नागरिक के हृदय में बहुत अंदर तक जाकर समाया हुआ है, अतः इस बात को दरकिनार किया जाए कि, मुस्लिम भी वंदे मातरम् को गाएं हीं। यदि वे सहर्ष गाते हैं, तो सर्वश्रेष्ठ है और नहीं गाते हैं, तो कोई बात नहीं के अंतर्गत लिया जाना चाहिए।
क्योंकि सत्य भी यही कहता है कि, किसी भी व्यक्ति के द्वारा वंदे मातरम् को सौ प्रतिशत मन से गाने में ही उसका पावन भाव प्रदर्शित हो सकेगा, कभी भी ज़ोर या जबरदस्ती से गाकर कदापि नहीं। इस बात से कौन मना कर सकता है कि, आज के समय में, दोनों ही समुदायों के बीच वैमनस्य का एक बड़ा कारण यह भी बना हुआ है। वंदे मातरम् एक ऐसा गान है, जो कि हर भारतीय के हृदय में स्थापित होकर, उसकी शुद्ध आत्मा से प्रवाहित होना चाहिए। और फ़िर हम सभी भारतीयों को , इस एक खुशखबरी पर अतिरिक्त रूप से प्रसन्न होना चाहिए कि, हाल ही में इतिहास में सर्वप्रथम बार भारतीय सीमा सुरक्षा बल की महिला पर्वतारोहण टीम ने, एवरेस्ट पर भारतीय झंडा फहराते हुए, वहां वंदे मातरम् का सस्वर गान किया है। अब इससे बड़ा आदर , वंदे मातरम् का और क्या हो सकता है।
वहीं दूसरी ओर मुस्लिम समाज जब तब , मौके बेमौके पशु बलि एवं गाय को काटने को एकदम जायज ठहराता रहता है। ईद पर पशु बलि तो हमारा मुस्लिम समाज, भारत में सैकड़ों वर्षों से निर्बाध रूप से देता चला आ रहा है, अतः ऐसा करना किसी भी एक भारतीय नागरिक के लिए आपत्ति का विषय नहीं रहता है, इसके ठीक विपरीत हिंदू समाज की संवेदनाएं तब आघात पाती हैं, जबकि गाय की कुर्बानी देने की बातें प्रकाश में प्रायः लाई जाती रहती हैं। ऐसा सनसनी उस हिंदू समाज के लिए , तब बर्दाश्त से बाहर हो जाता है, जबकि वह अपनी भावनाओं से बहुत गहरे तक जुड़ी गाय को अपनी ।। मां।। के नाते देखता और मानता है। गाय के शांत एवं निर्दोष स्वभाव की अर्चना करता है। उसे अपने से जुड़ा वात्सल्य का एक घरेलू पशु समझता है।
इस विवाद को अनावश्यक विस्तार तब मिलता है, जबकि अपनी राजनीति को चमकाने वाले और भड़काऊ कथन करने वाले कतिपय मुस्लिम व्यक्ति एवं राजनेता, आए दिन गाय की कुर्बानी को वाजिब करार देते हुए, उसे समयानुकूल बताने से बाज नहीं आते हैं। ऐसा दुष्कृत्य करते समय, वे न तो हिंदू समाज की आस्था की परवाह करते हैं और न ही मुस्लिम समाज का हित देखते हैं। आहत करने वाली इस प्रकार की कार्यवाहियों को भी सख्ती के साथ विराम देने की आवश्यकता है। ऐसे असामाजिक व्यवहार की आगे रहकर प्रत्येक व्यक्ति को जमकर निंदा करनी चाहिए। वातावरण ऐसा रचा जाए कि, दोनों ही समाज के एक भी व्यक्ति की मनोभावना को ज़रा भी पीड़ा नहीं पहुंचे।
यदा -कदा सामने आने वाले हिंदू मुस्लिम समाज के मनमुटाव पर देश के प्रख्यात कवि डॉ. कुमार विश्वास का यह कहना मानवीय न्याय की परिधि में ही आता है कि, ।। जाहिल और गंवार दोनों ही संप्रदायों में मौजूद हैं। हिंदू समाज अपने वालों को सम्हाले तथा मुस्लिम समाज अपने लोगों को, ताकि इनकी कुटिलता कामयाब नहीं हो सके।। आईए, हम सभी इसी सुदिशा में अग्रसर होते हुए, अपने मन के विचारों को साकार रूप देने की कोशिश करें
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