फ़िल्म समीक्षक: डॉ. महेन्द्र यादव
निर्देशक आदित्य धर की “धुरंधर: द रिवेंज” को देखकर सबसे पहला सवाल यही उठता है—इतना शोध आखिर किया कब? और अगर किया, तो फिल्म बनाने का समय कब मिला?
फिल्म दावा करती है कि यह सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि देश की कई “बड़ी सच्चाइयों” का खुलासा भी है। नोटबंदी से लेकर अंतरराष्ट्रीय साज़िशों तक, हर मुद्दे पर इतनी आत्मविश्वास भरी प्रस्तुति है कि दर्शक कुछ देर के लिए खुद को सिनेमा हॉल में नहीं, किसी गुप्त सरकारी ब्रीफिंग में बैठा हुआ महसूस करने लगता है। फर्क बस इतना है कि यहाँ पॉपकॉर्न साथ में मिलता है।
अभिनय — हीरो मेहनत पर, फिल्म बयानबाज़ी पर
रणवीर सिंह हमेशा की तरह ऊर्जा से भरपूर हैं। वे पूरी ईमानदारी से फिल्म को संभालने की कोशिश करते हैं, लेकिन पटकथा बार-बार उनके हाथ से माइक छीनकर खुद भाषण देने लगती है।
संजय दत्त, अर्जुन रामपाल, आर. माधवन और राकेश बेदी जैसे कलाकार भी मौजूद हैं, पर लगता है जैसे सभी को “रिसर्च की भीड़” में खड़ा कर दिया गया हो—जिसे जितनी जगह मिली, उतना बोल लिया।
संगीत — शायद रिसर्च में ही खो गया
पहले भाग में जहाँ संगीत दिल में बस जाता था, यहाँ लगता है संगीत निर्देशक भी किसी फाइल में “महत्वपूर्ण खुलासों” के बीच दब गए। गाने आते हैं, गुजर जाते हैं, और दर्शक को उतना ही याद रहते हैं जितना किसी लंबी मीटिंग के नोट्स।
असली कहानी या खुलासों की प्रदर्शनी?
फिल्म की सबसे बड़ी “ताकत” उसका सबसे बड़ा बोझ बन जाती है—खुलासे।
नोटबंदी क्यों हुई? किसका क्या कनेक्शन था? किसने किसे कहाँ भेजा?
ऐसा लगता है निर्देशक ने वर्षों तक रिसर्च करके सारी जानकारी एक ही फिल्म में डाल देने की ठान ली—चाहे कहानी सांस ले या नहीं।
और हद तो तब हो जाती है जब दाऊद इब्राहिम जैसे मोस्ट वांटेड शख्स, जिनका आज तक पुख्ता लोकेशन या ताज़ा फोटो दुनिया की बड़ी एजेंसियाँ भी सामने नहीं ला सकीं, उनका खुलासा फिल्म में इतनी सहजता से कर दिया जाता है मानो निर्देशक के पास सीधी “लोकेशन शेयर” आ गई हो। यह दृश्य रोमांच से ज्यादा व्यंग्य पैदा करता है।
कई जगह तो फिल्म इतनी आत्मविश्वास से “सच्चाई” बताती है कि इतिहास भी सोच में पड़ जाए—“भाई, ये सब हुआ था क्या?”
निर्देशन — जब फिल्म डॉक्यूमेंट्री बनने पर अड़ जाए
आदित्य धर की भव्यता और एक्शन में कोई कमी नहीं है, लेकिन इस बार वे कहानी सुनाने से ज्यादा “जानकारी देने” में व्यस्त नजर आते हैं। नतीजा यह होता है कि फिल्म कई जगह सिनेमा कम और यूट्यूब एक्सप्लेनेर वीडियो ज्यादा लगने लगती है।
और सबसे जरूरी बात—फिल्म को फिल्म ही रहने देना चाहिए। सिनेमा दर्शकों को जोड़ने का माध्यम है, न कि उन पर किसी विचारधारा को थोपने या किसी राजनीतिक छवि को चमकाने का औजार। जब कहानी की जगह संदेश हावी हो जाता है, तो मनोरंजन सबसे पहले कुर्बान होता है—और “धुरंधर 2” इसी का ताजा उदाहरण बन जाती है।
निष्कर्ष
“धुरंधर 2” एक ऐसी फिल्म है जो शायद अपने ही रिसर्च और विचारों के बोझ तले दब गई।
इतना कुछ बताने की कोशिश में यह भूल गई कि दर्शक टिकट सिनेमा देखने के लिए खरीदता है, शोधपत्र पढ़ने के लिए नहीं।
अगर आप रणवीर सिंह के फैन हैं, तो उनकी मेहनत के लिए फिल्म देख सकते हैं।
लेकिन अगर आप कहानी, संगीत और संतुलन की उम्मीद लेकर जा रहे हैं, तो हो सकता है फिल्म आपको भी “रिसर्च” का हिस्सा बना दे।
