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नई दिल्ली,। ईरान के तेल ठिकानों पर अमेरिका-इजराइल की एयर स्ट्राइक से राजधानी तेहरान और आसपास के इलाकों में आसमान में काले बादल छा गए। धुएं ने लोगों का सांस तक लेना मुश्किल कर दिया। ईरान की एक सोसायटी ने लोगों को एसिड रेन से बचने की चेतावनी दी है। इन जहरीले बादलों और एसिड रेन का ईरान के साथ-साथ बाकी दुनिया पर क्या असर पड़ेगा। इस समय ईरान से पाकिस्तान के पश्चिमी क्षेत्र (बलूचिस्तान) तक हवाएं उत्तर-पश्चिमी दिशा में बह रही है। पाकिस्तान का मौसम विभाग इन बादलों और जहरीले धुएं को लेकर पहले ही चेतावनी जारी कर चुका है। हालांकि भारत के मामले में अभी सीधा खतरा कम है। हिमालय और ईरान से दूरी इसकी मुख्य वजह है। फिर भी यदि ऊपरी सतह पर चलने वाली तेज हवाएं मजबूत हो, तो इस काले गुबार के महीन कण गुजरात, राजस्थान और पंजाब तक पहुंच सकते हैं। अफगानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान पहले प्रभावित होंगे। तेल जलने से निकलने वाले कण पांच से 10 दिनों में 2000 से 3000 किमी दूर तक फैल सकते हैं। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इस एसिड रेन का तत्काल प्रभाव एक से दो हफ्ते तक बना रह सकता है, लेकिन इसका दीर्घकालीन असर कई सालों तक महसूस होगा। मिट्टी में जमा एसिडिटी 10 से 20 साल तक बनी रह सकती है। यह मिट्टी की बफर क्षमता को खत्म कर देगी। इंसानों में इसकी वजह से श्वास संबंधित रोग 20 से 30फीसदी तक बढ़ सकते हैं। बच्चों और बुजुर्गों पर ज्यादा खतरा है। खेतों में उपज 10-15फीसदी कम हो सकती है। इससे आने वाले समय में खाद्य संकट भी पैदा हो सकता है। एसिड रेन से पेड़-पौधों की जड़ें कमजोर हो जाती है, पत्तियां झुलस जाती है और वनों की जैव विविधता नष्ट हो जाती है। इंसानों में न्यूरोलॉजिकल विकार संभव है। तेहरान जैसे घनी आबादी वाले शहर में जहां पहले से वायु प्रदूषण ज्यादा है, यह स्थिति महामारी जैसी बन सकती है। अतीत में वियतनाम का एजेंट ऑरेंज, यूक्रेन युद्ध का प्रदूषण जोखिम पैदा कर चुके है। ये केमिकल युक्त बादल भारी धातुओं जैसे लेड, मरकरी को मिट्टी व पानी में जमा करेंगे। इससे ये फूड चेन में शामिल हो जाएंगे और फिर खाने के जरिये शरीर में पहुंच कर डीएनए को नुकसान पहुंचा सकते हैं। पर्यावरण संरक्षण में देशों की इच्छाशक्ति से सकारात्मक परिणाम दिखे है। बता दें बीते एक साल में दुनिया ने 1.5 डिग्री स्तर की सीमा को पार कर लिया है। इन युद्धों की वजह से गर्मी और कितनी बढ़ सकती है? यह युद्ध उत्सर्जन को बढ़ाकर वॉर्मिंग को 2.3 से 2.5 डिग्री सेल्सियस तक ले जा सकता है। ईरान जैसे तेल उत्पादक देश में युद्ध से वैश्विक ऊर्जा संकट पैदा होगा, कोयले पर निर्भरता बढ़ेगी। इसकी वजह से भी गर्मी भयानक स्तर पर जा सकती है। ईरान को तुरंत वायु गुणवत्ता मॉनिटरिंग स्टेशन स्थापित करने, प्रभावित मिट्टी को चूने से न्यूट्रलाइज करने और स्वास्थ्य शिविर लगाने होंगे। भारत को पाकिस्तान सीमा पर निगरानी मजबूत और मॉनसून पूर्व चेतावनी जारी करनी चाहिए। विकासशील देशों के लिए जलवायु शांति कोष बनाया जाए, जो युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में हरित पुनर्वास फंड करे। अंतरराष्ट्रीय अदालत में पर्यावरण अपराध के मुकदमे चलाए जाएं।
