आधुनिक दौर में होली का बदलता स्वरूप
होली… यह सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि यादों का रंगीन संदूक है। जैसे ही फाल्गुन की हवा चलती थी, मोहल्ले की गलियों में एक अलग ही हलचल शुरू हो जाती थी। बचपन की वह होली आज भी मन के किसी कोने में वैसी ही महकती है—सादगी, अपनापन और उत्साह से भरी हुई।
हमारे समय में होली की तैयारी कई दिन पहले से शुरू हो जाती थी। मोहल्ले के सारे लड़के इकट्ठा होकर होली जलाने का प्रबंध करते थे। लकड़ियाँ जुटाना, जगह तय करना और फिर रात-रात भर योजनाएँ बनाना—यह सब अपने आप में एक उत्सव होता था। कई बार अलग-अलग ग्रुप बन जाया करते थे और फिर होड़ लगती थी कि सबसे बड़ी होली किसकी होगी। उस मासूम प्रतिस्पर्धा में भी दोस्ती की मिठास होती थी।
होली का रंग केवल एक दिन का नहीं होता था। होली से लेकर रंग पंचमी और फिर श्री सप्तमी तक यह त्योहार पूरे उत्साह के साथ चलता था। हर दिन एक नई उमंग, एक नई शरारत और एक नई कहानी लेकर आता था।
घर के भीतर भी त्योहार की रौनक कम नहीं होती थी। मां, बहनों और बुआओं के साथ बैठकर उनका हाथ बँटाने की कोशिश करना आज भी याद है। घरों में गुजिया, बेसन चकती और शक्कर पारे जैसे पारंपरिक पकवान बनते थे, जिनका इंतजार साल भर रहता था। उस समय बाजार से सब कुछ खरीद लेने की सुविधा नहीं थी, लेकिन घर के बने स्वाद में जो प्यार घुला होता था, वह किसी भी मिठाई की दुकान से बड़ा होता था।
होली के दिन हम दोस्त घर-घर जाकर एक-दूसरे को निकालते और फिर टोलियों में घूमते थे। गलियों में ढोलक की थाप, हंसी-मजाक और रंगों की बौछार—यही हमारी दुनिया थी। कभी-कभी तो किसी अनजान को भी पकड़कर रंग से भरे कड़ाव में डाल देना उस समय की शरारतों का हिस्सा होता था, और उसका मज़ा ही कुछ और होता था। उस रंग में कोई भेदभाव नहीं था—न बड़ा, न छोटा, न अमीर, न गरीब—सब एक ही रंग में रंग जाते थे।
लेकिन वक्त के साथ बहुत कुछ बदल गया। आजकल कुछ लोग तिलक होली का उपदेश देते हैं और पानी बचाओ का नारा लगाते हैं। पर्यावरण की चिंता अपनी जगह सही है, लेकिन कभी-कभी लगता है कि इस बहाने कहीं हम अपने पारंपरिक त्योहारों की आत्मा को ही खोते जा रहे हैं।
अब माहौल भी बदल चुका है। गली-मोहल्लों में खेले जाने वाली होली धीरे-धीरे बड़े होटल, रिसॉर्ट, फार्महाउस और क्लबों में शिफ्ट होती जा रही है। ढोल की थाप और फाग के गीतों की जगह अब तेज आवाज वाले DJ ने ले ली है। महंगे टिकट और तामझाम ने इसे एक तरह से उच्च वर्गीय आयोजन बना दिया है, जहाँ आम आदमी की सहज भागीदारी कम होती जा रही है।
कभी-कभी मन सवाल करता है—क्या यही वह होली है, जिसका हम इंतजार किया करते थे? क्या रंगों का यह त्योहार अब रिश्तों के रंगों से दूर होता जा रहा है?
मेरे लिए होली आज भी वही है—मोहल्ले की गलियों में गूंजती हंसी, घर की रसोई से आती गुजिया की खुशबू, और दोस्तों के साथ रंगों में भीगने का वह निश्छल आनंद। शायद जरूरत इस बात की है कि आधुनिकता के साथ-साथ हम अपनी परंपराओं की आत्मा को भी बचाए रखें।
क्योंकि होली केवल रंगों का नहीं, बल्कि दिलों को रंगने का त्योहार है।
और अगर दिल ही बेरंग हो जाएँ, तो फिर होली का रंग भी फीका पड़ जाता है।
