इंदौर। जिन्होंने आज़ादी के पूर्व के राजवंश और रियासती इंदौर को देखा, फिर स्वतंत्रता की भोर से लगाकर धीरे -धीरे आज के इंदौर को आकार लेते अपनी आँखों से देखा, ऐसी सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता एवं अनेक व्यक्तिगत गुणों की खान श्रीमती कंचनदेवी सेठी जी का विगत दिनों देवलोकगमन हो गया. अनुपम और आदर्श जीवन जीने की मिसाल क़ायम करने के साथ आपने दिगंबर जैन श्राविका संघ की आजीवन परम संरक्षक के रूप में सामाजिक गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निबाही। आपके अवसान से शोक की लहर फ़ैल गई एवं देश भर से कला, संगीत, उद्योग जगत की हस्तियों एवं गणमान्य नागरिकों के शोक सन्देश प्राप्त हुए.
लगभग सौ वर्ष का स्वस्थ – सक्रिय, सार्थक जीवन
आदरणीय कंचनदेवीजी सेठी का जन्म 1924 में रक्षाबंधन के दिन हुआ था. लगभग पंद्रह वर्ष की आयु में इंदौर के प्रतिष्ठित सेठी परिवार, आनंद भवन वालों के यहाँ सेठ माणकचंद सेठी जी की ब्याहता बन इंदौर पधारीं कंचनदेवी जी ने वृहद परिवार में अपनी सूझबूझ, कार्यकुशलता और सहज प्रेमपूर्ण लेकिन ज़िम्मेदारी के भाव से परिपूर्ण व्यवहार से संयुक्त परिवार में इस तरह अपना स्थान बनाया, परिवार के सभी सदस्यों के साथ मिलजुल कर रहते हुए अपनी अथाह कुशलता से गृहप्रबंध किया कि अंतिम समय तक वे सर्वमान्य अधिष्ठाता बनी रहीं। सबका ध्यान रखने की उनके वात्सल्यपूर्ण आशीर्वाद की छाँह को न केवल परिवार अपितु पारिवारिक मित्रों, प्रतिष्ठानों और घर के कर्मचारियों एवं समाजजनों ने भी महसूस किया। वे हर कार्य को रुचिपूर्वक करतीं एवं नई विधाओं को सीखने के लिए तत्पर रहतीं। अपने पाँचों पुत्रों सर्वश्री अरुण सेठी (श्री दिगंबर जैन उदासीन श्राविकाश्रम के सह मंत्री) , अरविन्द, अम्बरीष, सुशील एवं योगेंद्र (जाने -माने चित्रकार एवं ज्वेलरी डिज़ाइनर) को कला, धर्म और जीवन में समभाव से रहने के और जैनत्व के संस्कार दिए वहीं अपने पड़पोतो के साथ नियमित रूप से बाल क्रीड़ा कर एक अनुपम आनंद लेने का महत्व भी बड़ी खूबी से वे जानती थीं. विवाह के पश्चात उन्होंने उच्चकोटि की शिक्षा घर पर ही पाई। हिंदी – अंग्रेजी शास्त्र एवं स्वाध्याय की पुस्तकें पढ़ना उनके दैनन्दिनी जीवन का हिस्सा रहा. आज से लगभग सात दशक पहले मोटर गाड़ी चलाना, देश – विदेश यात्राएं ,पिकनिक एवं गीत संगीत, लघु नाटिकाओं, गोष्ठी आदि के माध्यम से आपने कलात्मक अभिरुचि का जीवन जिया भी और अपने परिचय क्षेत्र में जीवनकाल को धार्मिकता के साथ, किंतु रूढ़ीवादिता से दूर रहकर आनंदपूर्ण रीति से जीने की शिक्षा भी दी. विनयवान और सरलस्वभावी होने के साथ वे दृढ़ विश्वासी, दानशील एवं अपने कर्तव्यों के प्रति बहुत सचेत थीं. वृहद परिवार में काकी सा., मामी सा. से लगाकर बड़ी दादी सा. आदि तक अनेक सम्बोधनों से भी जानी जाने वाली श्रीमती सेठी परिवार की अनेक पीढ़ियों – पुत्रों- बहुओं, पोते- पोतियों एवं पड़ पोते -पोतियों को अच्छे संस्कारों से पल्लवित कर उन्हें बेहतर नागरिक बनाने के लिए वे लगन के साथ प्रयास करती थीं.
धार्मिक एवं सामाजिक जीवन में सक्रियता की मिसाल
97 वर्षीय श्रीमती कंचनदेवी सेठीजी का जीवन अत्यंत धार्मिक, पुण्यशाली एवं स्नेहमयी रहा। श्री दिगम्बर जैन उदासीन श्राविकाश्रम कंचन बाग, इंदौर की जीवन काल पर्यन्त परम संरक्षक रहकर उन्होंने समाज के हर पहलू में सक्रिय योगदान दिया। सभी धार्मिक आयोजनों की रूपरेखा बनाने से लेकर उसकी पूर्णाहुति तक वे सजगता से कार्य का निरीक्षण भी करतीं और आवश्यकतानुसार उदारता पूर्वक सहयोग भी देतीं। दादी सा.श्रीमती चंदाबाई सेठी के संपर्क में रहकर एवं पं. रतनलाल जी के सानिध्य में श्रीमती कंचनदेवी सेठीजी ने अपनी धार्मिक प्रवृत्ति को बड़ी दृढ़ता के साथ सींचा व धर्म का पालन किया । अंतिम समय तक भी वे तबियत अनुसार नित्य मंदिर एवं देव दर्शन पश्चात ही भोजन ग्रहण करती थीं। कलश , शांतिधारा , प्रवचन , स्वाध्याय, स्तुति वाचन, भक्तामर स्तोत्र , इत्यादि से भी अपने जीवन को तो सजा रखा था और उनके सान्निध्य में किसी संत सी सरल प्रकृति वाली सदा शुभ विचारने वाली उदारमना वैराग्य और तपमूर्ति, प्रेममूर्ति के सान्निध्य का भाव उत्पन्न होता था. उनकी शुभ ऊर्जा सहज ही उनके निकट महसूस की जा सकती थी. वे अष्टान्हिका, चातुर्मास एवं पर्युषण पर्वों के समय -संयम नियम का पालन परिवार के साथ प्रतिवर्ष करती थीं. ये ईश्वर का चमत्कार ही था कि कई दशकों तक चश्मा लगने के बाद जीवन के अंतिम कुछ वर्षों में उनकी नेत्र ज्योति एकदम स्वस्थ हो गई थी और वे बिना चश्मा नियमित पाठ , शास्त्र एवं प्रवचन को बाँचना एवं धार्मिक प्रभावना वाले टीवी चैनल आदि देखतीं और बुद्धि से तत्व ज्ञान ग्रहण करतीं। लगभग शतायु अवस्था में उन्हें भक्तामर स्त्रोत – देव स्तुति कंठस्थ थी और वे नियम से बाँचती थीं। सामाजिक धार्मिक कार्यों में सबसे महत्वपूर्ण आपने श्राविका आश्रम को अनेक वर्षों से सुचारूरूप से संचालन किया । 1941 में बड़वानी तीर्थ में सर्वप्रथम पंचकल्याणक श्री आदिनाथ भगवान की विशालकाय प्रतिमा की प्रतिष्ठा अपने सानिध्य में करने का दुर्लभ पुण्य लाभ प्राप्त किया ।
अजातशत्रु कंचनदेवीजी का जीवन समता भाव का श्रेष्ठ उदहारण
आदरणीय श्रीमती कंचनदेवी सेठी के जीवन में दुःख और कठिन समय भी आया और सर्वांगीण पारिवारिक विकास का समय भी. लेकिन, उन्होंने समभाव से अपने मन में किसी के प्रति बैरभाव या कटुता ना लाते हुए सभी से बिना किसी अपेक्षा के सहज प्रेमपूर्ण व्यवहार रखा. अनेक ज्ञानी अध्ययनकारों को भी उनका जीवन आदर्श लगता रहा. संत सेवा और धर्म सेवा से परिपूर्ण परोपकारी जीवन जीने वाली श्रीमती कंचनदेवी जी सेठी हमारी सनातन संस्कृति में वर्णित जीवन शैली का श्रेष्ठ रीति से पालन करते हुए अंत समय में भी बिना किसी को कष्ट दिए शांतिपूर्वक देवलोक सिधारीं। अंतिम क्षणों में बाल ब्र. पंडित श्री रतनलाल जी शास्त्री उन्हें धार्मिक स्तोत्र ,णमोकार मंत्र इत्यादि सुनाते रहे और वे चेतन अवस्था में सुनते हुए, उच्चारण करते हुए, शनैः शनैः सभी का त्याग करते हुए , शांत मन से, सभी से क्षमा याचना करते हुए अपनी आत्मा में विलीन हो गईं. इंदौर ने अपने गौरवशाली इतिहास का एक सदाचारी प्रत्यक्षदर्शी खो दिया। उनके मीठे व्यवहार की छाया भले ही अब ना मिले किन्तु उनकी स्मृति और संस्कारों की सुगंध हमेशा विद्यमान रहेगी। समाज के विभिन्न क्षेत्रों की हस्तियों ने उनके देहावसान पर शोक प्रकट किया है।
