डीएए से बदल रहा हिप रिप्लेसमेंट का तौर-तरीका: अस्पताल में कम दिन और मरीज की अवस्था में सुधार
इंदौर, 17 जनवरी 2026। कूल्हे के दर्द और चलने-फिरने में होने वाली रुकावट आज शहरी ही नहीं, ग्रामीण भारत में भी तेजी से बढ़ रही है। गठिया, चोट या उम्र से होने वाले जॉइंट डैमेज के कारण अनेक मरीज वर्षों तक दर्द झेलते रहते हैं और अंत में हिप रिप्लेसमेंट की जरूरत पड़ती है। ऐसे में आधुनिक तकनीकें सर्जरी को सुरक्षित, कम दर्दनाक और तेज़ रिकवरी वाली दिशा में ले जा रही हैं। इन्हीं आधुनिक तकनीकों में से एक है डीएए हिप रिप्लेसमेंट, यानी डायरेक्ट एंटीरियर अप्रोच, जिसकी मांग देश में तेजी से बढ़ रही है।
भारत में डीएए तकनीक को अपनाने और उसके परिणामों को लेकर *केयर सीएचएल हॉस्पिटल, इंदौर के ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. विकास जैन बताते हैं,* “डीएए हिप रिप्लेसमेंट उन मरीजों के लिए एक बड़ा परिवर्तन लेकर आया है जिन्हें चलने-फिरने में दर्द और कठिनाई का सामना करना पड़ता है। इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें मांसपेशियों को सुरक्षित रखा जाता है, जिससे रिकवरी तेज़ होती है और मरीज ऑपरेशन के तुरंत बाद ही एक्टिव हो पाते हैं। हमारी कोशिश हमेशा यही रहती है कि मरीजों को कम दर्द, ज्यादा गतिशीलता और बेहतर जीवन गुणवत्ता मिले।”
यह तकनीक पारंपरिक हिप रिप्लेसमेंट से अलग है क्योंकि इसमें सर्जन जांघ के सामने से एक छोटा चीरा लगाकर जोड़ तक पहुँचते हैं। इस प्रक्रिया में मांसपेशियों को काटा नहीं जाता, बल्कि उनके बीच मौजूद प्राकृतिक गैप से होकर गुजरते हैं। यही कारण है कि यह तकनीक मसल-प्रिजर्विंग (muscle-preserving) मानी जाती है और मरीज ऑपरेशन के तुरंत बाद ही खड़े होकर चलने का प्रयास कर सकते हैं। इस प्रक्रिया में घिसी हुई हड्डी और कार्टिलेज हटाकर कृत्रिम जोड़ (इम्प्लांट) लगाए जाते हैं, जिससे दर्द में राहत और गतिशीलता में सुधार मिलता है।
डीएए तकनीक के चलते मरीजों को पारंपरिक सर्जरी में दी जाने वाली कई सावधानियों—जैसे पैरों को क्रॉस करके न बैठना या विशेष मुद्राओं से बचना—की आवश्यकता बहुत कम रह जाती है। साथ ही अस्पताल में भर्ती रहने का समय भी घटता है और मरीज दैनिक गतिविधियों में जल्दी लौट आते हैं। कई देशों में इस तकनीक को स्पोर्ट्स इंजरी और अर्ली-मॉबिलिटी के मामलों में भी चुनिंदा विकल्प के तौर पर अपनाया जा रहा है।
डीएए तकनीक का एक महत्वपूर्ण लाभ यह है कि इसमें छोटा चीरा लगाया जाता है और बड़ी मांसपेशियों पर कोई छेड़छाड़ नहीं होती, जिससे मरीज मात्र 24 घंटे में चलना शुरू कर देता है और शीघ्र डिस्चार्ज संभव हो जाता है। इस तकनीक में सर्जरी के दौरान दोनों पैरों की लंबाई को बराबर बनाए रखा जाता है, जिससे ऑपरेशन के बाद न तो लचक आती है और न ही लंगड़ापन रहता है। इसके अतिरिक्त इस तकनीक में सर्जरी के बाद डिसलोकेशन का खतरा अत्यंत कम माना जाता है। उपचार के बाद मरीज जमीन पर बैठने, भारतीय शौचालय का उपयोग करने, व्यायाम, जॉगिंग, रनिंग और जिम जैसी गतिविधियाँ भी सामान्य जीवन की तरह कर पाते हैं, जिससे उनके जीवन की गुणवत्ता में स्पष्ट सुधार देखा जाता है।
*डॉ जैन के अनुसार* “यह तकनीक उन मरीजों के लिए उपयोगी है जिन्हें गंभीर गठिया, डीजेनेरेटिव जॉइंट डिजीज या हिप मूवमेंट में कठिनाई की समस्या हो। हालांकि हर मरीज का शरीर, आयु और स्थिति अलग होती है, इसलिए किसे यह प्रक्रिया उपयुक्त है, इसका निर्णय विशेषज्ञ ही दे सकते हैं। विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि भारत में बढ़ती जागरूकता और आधुनिक अस्पतालों में उपलब्ध तकनीक के कारण बीते कुछ वर्षों में इस प्रक्रिया के प्रति विश्वास बढ़ा है।”
