Aaj ka Panchang 14 October 2026: माता के चौथे स्वरूप मां कूष्मांडा की करें पूजा, नोट करें शुभ मुहूर्त, राहुकाल और पूरा पंचांग
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आष्टा नि.प्र. – मन को वन नहीं उपवन या तपोवन बनाना है क्योंकि वन तो जंगल होता है जहां जंगल का कानून चलता है कोई अनुशासन नहीं होता है। जबकि उपवन को नियंत्रित करते हुये सजाया जाता है इसलिये मन को उपवन बनाना है वन नहीं और यदि मन तपोवन बन जाये तो क्या ही बात है। जहां संयम है, अनुशासन है, स्वयं पर नियंत्रण है वहीं मानव की मानव होने की सार्थकता है मानव की जीत है। उक्त उद्गार नगर में चातुर्मास हेतु विराजित प.पू. साध्वीवर्या नम्रव्रताश्रीजी म.सा. नें अपने इस अंतिम चातुर्मासिक प्रवचन के दौरान व्यक्त किये।
जैन धर्म के साधु संतो की वर्षाकाल के दौरान केवल चार माह ही एक स्थान पर स्थिरता रहती है बाकी आठ माह वे एक स्थान पर न रहते हुये नंगे पैर विचरण करके विभिन्न स्थानो पर धर्मोपदेश देते रहते हैं। इस बार प.पू.साध्वीवर्या नम्रव्रता श्रीजी, मग्नव्रता श्रीजी और मीतव्रता श्रीजी म.सा. का चातुर्मास 5 जुलाई से नगर के श्री महावीर स्वामी श्वेताम्बर मंदिर गंज के उपाश्रय में प्रारंभ हुआ था जो कार्तिक पूर्णिमा को दिनांक 05 अक्टूबर को पूर्ण हुआ और साध्वीवर्या का चातुर्मास परिवर्तन प्रेमचंद बागमल वेदमुथा परिवार के सुपुत्र तरूण चतरमुथा के गल चौराहा स्थित नव निर्मित निवास पर करवाया गया था और उसके अगले दिन साध्वीवर्या का नगर से विहार जैन श्वेताम्बर भक्ताम्बर तीर्थ की ओर हुआ।
प्रवक्ता अतुल सुराणा नें बताया कि इस बार का चातुर्मास ऐतिहासिक रहा। चातुर्मास समिति का दायित्व अध्यक्ष दंपत्ति देशचंद वोहरा एवं श्रीमती भावना वोहरा ने संभाला तथा समिति के कंधे से कंधा मिलाकर श्रीसंघ अध्यक्ष पवन सुराणा, गंज मंदिर ट्रस्ट अध्यक्ष नगीन वोहरा एडवोकेट, प्रदीप धाड़ीवाल, प्रताप चतरमुथा, पवन श्रीश्रीमाल, मनोज ललवानी, अतुल सुराणा, पराग धाड़ीवाल आदि नें सभी समाजजनो के साथ सहयोग प्रदान किया। साध्वीमण्डल की विदाई का दृश्य अत्यंत भावविभोर करने वाला रहा। प्रातः ठीक 6.30 बजे साध्वीमण्डल का प्रस्थान वेदमुथा निवास से हुआ और पहला पड़ाव दिगंबर जैन समाज द्वारा निर्मित संत निवास रहा जो इंदौर की ओर 7 किलोमीटर दूर स्थित है। साध्वीमण्डल को विदाई देने सैकड़ो की संख्या में श्रद्धालु जयकारे लगाते हुये उनके साथ पहले पड़ाव पर पहुंचे जिसमें महिलाओं की संख्या अधिक थी। सभी के स्मृति पटल पर इस चातुर्मास की सुखद स्मृतियां और अनुभव जीवंत हो उठे। साध्वीमण्डल के वियोग नें सभी को भावुक कर दिया और सभी की आंखे नम हो गई। साध्वीमण्डल के सरल स्वभाव, धर्म के प्रति अनुराग और ज्ञान नें सभी को चुबंक की भांति उनकी ओर खींचा था और जब वे ही आज बिछड़ रहे थे तो उनकी विरह वेदना सभी के लिये असहनीय हो उठी परंतु इसी राग और मोह से बचने के लिये ही प्रभु महावीर के नियमानुसार संत एक स्थान पर लंबे समय तक नहीं ठहरते हैं और इसी नियमानुसार सभी समाजजनो द्वारा साध्वीमण्डल की शिक्षाओं और उपदेशो को हृदय में धारण करने का संकल्प लेते हुये आज उनकी नगर से विदाई इसी भावना के साथ सम्पन्न हुई कि जब भी सुयोग होगा वे पुनः नगरवासियों को धर्ममार्ग प्रशस्त करने हेतु अवश्य पधारेगें
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