अशोकसागर सुरीश्वर जी के म. सा. की निश्रा में 200 अवधान का अद्भुत प्रयोग
दैनिक माधव एक्सप्रेस
उप संपादक अश्विन चोपड़ा
उज्जैन : श्वेतांबर जैन मूर्तिपूजक तपागच्छ के सागर समुदाय के उज्जैन-भैरूगढ़ माणिभद्रजी तीर्थ उद्धारक शासनप्रभावक पू. आ. श्री अशोकसागरसूरीश्वरजी म. की निश्रा में उज्जैन में पहली बार 10अगस्त रविवार को सुबह 8 बजे मोनी बाबा आश्रम गंगा घाट मंगलनाथ रोड पर 200 अवधान का प्रयोग हो रहा है।अवधान के आयोजक श्री आदीश्वर चन्दप्रभु जैन श्वे.मू.पू.चा.थु.पा. ट्रस्ट उज्जैन,श्री माणिभद यक्षराज तीर्थधाम आगमोद्धारक चातुर्मास समिति भेरुगढ उज्जैन रहेंगे ।सागरचंदसागरसुरि जी म. सा. ने प्रेस वार्ता में बताया कि पू. आ. जिनचंद्रसागरसूरिजी म. के शिष्य प्रवचन प्रभावक-200 अवधान के प्रेरक आ. सागरचंद्रसागरसूरिजी के शिष्यरत्न वर्धमान तपोनिधि पू. गणी तीर्थचंद्रसागरजी म. के शिष्य मुनि वैराग्यचंद्रसागर के द्वारा यह 200 उवधान का प्रयोग हो रहा है। सागर समुदाय की उञ्जवल परंपरा में अवधान का गहरा संबंध रहा है।मुनि वैराग्यचन्द्र म. सा. मारवाड़ अगियार गाम विशा पोरवाल जैन समाज के काछोली (राज.) के कुलदीपक है। दीक्षा के पूर्व अहमदाबाद-साबरमती में सन् 1998 में 12वीं कक्षा में गुजरात बोर्ड में दूसरे स्थान पर उत्तीर्ण हुए, लेकिन दीक्षित भाई मनि तीर्थचन्द्र म.सा. के पास वेकेशन में गये हुए थे, रिजल्ट लेने के बाद घर नहीं गये और पू. सागरचंद्रसागरसूरिजी के चरणों में जीवन समर्पण कर आज से 26 वर्ष पूर्व 1999 में दीक्षा का स्वीकार किया। उनकी माता साध्वी जिनर्षिताश्रीजी एवं बहन साध्वी महर्षिताश्रीजी ने भी दीक्षा ली है। मुनिश्री ने गुरु सानिध्य में श्रमणचर्या एवं संस्कृत का अध्ययन करके लाडनूं युनिवर्सिटी से पत्राचार कोर्स से जैनोलोजी में बी.ए.,एम.ए. किया। जयपुर युनि. से प्राकृत अकादमी परीक्षा में गोल्ड मेडल प्राप्त किया।एवं मुंबई युनिवर्सिटी से आगमोद्धारक श्री के जीवन कवन-साहित्य पर पी.एच.डी. डिग्री प्राप्त की। मुनिश्री की यह प्रयोग साधना में पू. गुरुदेव आ. सागर चन्द्रसागरसूरिजी की प्रबल प्रेरणा एवं सभी सहवर्ती मुनिगण का प्रशस्य सहयोग रहा है। मोबाईल-कम्प्यूटर के जमाने में मुनिश्री का 200 अवधान का यह प्रयोग युवा-विद्यार्थीओ के लिए पावरफुल प्रेरणा और ज्वलंत आदर्शरूप रहेगा।अवधान यानि ध्यान एवं संयम के माध्यम से उत्पन्न हुई धारणा शक्ति-स्मरणशक्ति का एक अद्भुत प्रयोग है। आत्मा अनंतगुणों से युक्त है, उसमें ज्ञान गुण प्रबल है। आत्मा के उपर लगे हुए ज्ञानावरणीय कर्म के टूटने,हटने पर ज्ञान गुण का प्रभाव दिखने मिलता है।अवधान साधनों से दूर हटकर साधना से शक्ति प्राप्ति की एक मिशाल है। विज्ञान के अनुसार मनुष्य का मन जो कुछ सुनता-पढ़ता-सोचता है उसका प्रथम संगह ज्ञात मन में होता है। ज्ञात मन के सिवा एक अज्ञात मन (सब कॉन्शीयस माईंड) को भी विज्ञान मानता है, जो ज्यादा शक्तिशाली है। ज्ञात मन से जो बात अज्ञात मन में जाती है वो ज्यादा समय टिकती हे और ज्यादा असरकारक होती है। जब उसके संस्कार गाढ हो जाते है तो दूसरे जन्म तक साथ आते है जिसके प्रभाव से जातिस्मरण जैसी घटनाएँ सुनने मिलती है। अवधान भी ऐसी घटना को साबित करनेवाला एक प्रयोग है। श्री आदीश्वर चन्दप्रभु जैन श्वे.मू.पू.चा.थु.पा. ट्रस्ट उज्जैन के अध्यक्ष सुभाष दुग्गड एवं उपाध्यक्ष अश्विन मेहता,अभय मेहता, प्रकाश सांवरा, रविंद्र डागा, प्रदीप दख, कमल जैन आदि ने संयुक्त रूप से सभी धर्मप्रेमी जनता को अवधान में आमंत्रित किया है।
200 अवधान का प्रयोग
इस प्रयोग में मुनि वैराग्यचंद्रसागर 1 से 200 तक सुनकर क्रम में बताने के बाद पश्वाद् क्रम = उल्टे क्रम से यानि की 200 से 1 तक बताएँगे तथा वस्तु/नाम कहने पर उसका नंबर भी बताते हैं। अनानुक्रम यानि की रेन्डमली बीच में से जो नंबर कहे उसे नंबर की वस्तु भी बताते हैं।
अवधान युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा
मोबाइल कंप्यूटर के जमाने में मुनिश्री का 200 अवधान का प्रयोग युवा विद्यार्थियों के लिए पावरफुल प्रेरणा और उज्जवल आदर्श रूप रहेगा। मनी मोबाईल-मस्ती के पीछे पागल हुई युवा पीढ़ी के लिए माइंड पावर-मोटिवेशन पावर और ध्यान शक्ति के प्रभाव को दिखानेवाला यह प्रयोग एक मिरेकल से कम नहीं है।