डॉ. महेन्द्र यादव की पाती थोड़ी जज़्बाती
— पं. ओम व्यास ‘ओम’ की पुण्यतिथि पर विशेष श्रद्धांजलि
कुछ रिश्ते शब्दों से नहीं, आत्मा से जुड़ते हैं…
कुछ चेहरे भले ही दुनिया के लिए परिचित हों, लेकिन हमारे जीवन की दिशा बदल देते हैं…
साल 2001, जब मैंने अंतरराष्ट्रीय ठहाका सम्मेलन की पहली नींव रखी — मेरे मन में एक अलग ही आयोजन की कल्पना थी।
मैं चाहता था एक ऐसा मंच, जहाँ सिर्फ कवि न हों, बल्कि फिल्म कलाकार, मिमिक्री आर्टिस्ट, स्टैंडअप कॉमेडियन और साहित्यिक प्रतिभाएँ एक साथ नज़र आएँ।
एक मंच जहाँ हँसी हो, तीखा व्यंग्य हो, और समाज का आईना भी।
मुझे ऐसे मंच संचालन की आवश्यकता थी जो इस नये प्रयोग को जीवन दे सके — और ऐसे में मेरे ज़ेहन में सिर्फ एक ही नाम आया…
पंडित ओम व्यास ‘ओम’।
उस वक्त मैं बिल्कुल नया था — मुझे कोई नहीं जानता था।
जबकि पंडित ओम व्यास ‘ओम’ उस समय देश के लोकप्रिय हास्य कवियों में शुमार थे। वे मंच पर एक बेहद प्रभावशाली और प्रिय चेहरा बन चुके थे।
फिर भी जब मैंने उन्हें ठहाका सम्मेलन की रूपरेखा सुनाई — “ठहाका अदालत”, जिसमें मंच पर जनप्रतिनिधि, आईएएस, आईपीएस अफसरों को कटघरे में खड़ा कर चुटीले सवाल-जवाब करने थे, और मैं स्वयं वकील की भूमिका निभाने वाला था — तो ओमजी मुस्कराए, और बोले:
“यादव साहब, ये तो देश में पहली बार होगा… और मैं पूरी जान लगाकर साथ हूँ।”
बस, यहीं से वह ऐतिहासिक यात्रा शुरू हुई।
ओम जी ने लगातार पाँच वर्षों तक मंच संचालक की भूमिका निभाई — और केवल संचालन ही नहीं, बल्कि पूरे ठहाका सम्मेलन की आत्मा बन गए।
उनकी वाणी में मालवा की मिट्टी की सौंधी खुशबू थी, और अंदाज़ में ऐसी आत्मीयता, जो श्रोताओं को बाँध लेती थी।
उन्होंने सिर्फ कवियों को नहीं, पूरे आयोजन को, मेरे स्वप्न को शब्द दिए, दिशा दी और प्रतिष्ठा दिलाई।
उनके मंच पर आते ही जो ठहाका गूंजता था, वह केवल हँसी नहीं, एक सांस्कृतिक आंदोलन का आरंभ था।
आज उनकी पुण्यतिथि है।
वे भले ही शारीरिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके ठहाके, उनका आत्मीय संचालन, और उनकी स्मृति — आज भी हर आयोजन में हमारे साथ हैं।
समस्त ठहाका सम्मेलन परिवार की ओर से उन्हें शत्-शत् नमन।
आप गए नहीं हैं ओमजी, आप हर साल, हर ठहाके में, हर तालियों में, और हर मुस्कान में ज़िंदा हैं।
