डॉक्टर महेन्द्र यादव की पाती थोड़ी जज़्बाती
वक़्त की रेत पर जब भी नज़रों को पीछे घुमाता हूं, कुछ धुंधली मगर अनमोल यादें दिल के आईने में साफ़-साफ़ उभर आती हैं। वो सुबहें, जब मुंह अंधेरे माँ की पुकार सुनकर आँखें मलते हुए उठना पड़ता था। आलस्य से भरी आवाज़ में “बस पाँच मिनट और…” कहने की भी कोई कीमत नहीं होती थी, क्योंकि माँ के हाथों में पानी से भरी बाल्टी होती थी। स्कूल जाने से पहले का वो ड्रामा, नाश्ते के बहाने देर करना, किताबें ढूंढने के बहाने कुछ और सुस्ती लेना – सब जैसे कल की ही बात हो।
तब मोबाइल नहीं थे, बस एक रेडियो था, जिस पर हर सुबह ‘विविध भारती’ का मधुर संगीत गूंजता था। घर की छत पर लगे एंटीना को घुमाने का संघर्ष, जिससे दूरदर्शन के चैनल ठीक से दिखें, और जब रविवार को ‘महाभारत’ या ‘रामायण’ शुरू होता था, तो पूरा मोहल्ला टीवी के सामने जम जाता था। न पड़ोसी पराये लगते थे, न रिश्ते औपचारिक।
बचपन की वो दोपहरें भी अजीब थीं। तपती धूप में भी गली के नुक्कड़ पर क्रिकेट खेलते रहना, और जब गेंद किसी पड़ोसी के घर में चली जाती, तो उसे वापस लाने का रोमांच भी खेल का ही हिस्सा होता। गर्मियों की छुट्टियों में नानी के घर जाने की वो बेकरारी, जहां आम के बगीचे में पेड़ पर चढ़ने की प्रतियोगिता होती थी। न मोबाइल गेम्स की लत थी, न सोशल मीडिया का आकर्षण—बस मिट्टी में खेलना, हंसना, रोना और फिर हंस देना ही हमारी दुनिया थी।
शाम को छतों पर पतंगबाज़ी का जोश, चाय के साथ बैठकर दादा-दादी की कहानियां सुनना और बिजली कटने पर पूरे मोहल्ले का एक ही जगह जमा हो जाना—ये सब अब कहीं खो गया है। आजकल रिश्ते फोन की स्क्रीन में सीमित हो गए हैं, बच्चे आंगन में खेलने के बजाय ऑनलाइन गेम्स में खोए रहते हैं, और हम खुद भी सोशल मीडिया पर अजनबियों की ज़िंदगी में झांकने में इतने व्यस्त हैं कि अपने ही घर में अपनों से दूर हो गए हैं।
काश, फिर से वो दिन लौट आए, जब खुशियां छोटी-छोटी चीज़ों में बसी होती थीं, जब अपनापन किसी खास मौके का मोहताज नहीं था, जब किसी के घर बिना बुलाए जाने में संकोच नहीं होता था। वो बीता हुआ जमाना भले ही लौटकर न आए, लेकिन उसकी यादें हमेशा हमारे दिलों में जिंदा रहेंगी…
क्योंकि सच तो यही है—वो दिन भी क्या दिन थे…!
