
डॉ. महेन्द्र यादव की पाती थोड़ी जज्बाती
कुम्भ स्नान का अवसर प्राप्त हुआ। मन में असीम संतोष और आनंद था। गंगा में डुबकी लगाते ही जैसे समस्त पाप धुल गए—या कम से कम ऐसा महसूस हुआ। लेकिन फिर युगधर्म ने सिर उठाया।
पहले तो संकल्प लिया कि फोटो-वीडियो नहीं डालूंगा। भक्ति हृदय की चीज़ है, इसका दिखावा क्यों? परंतु तभी मन में एक संशय जागा—कहीं ऐसा तो नहीं कि कुम्भ स्नान का पुण्य डिजिटल प्रमाणपत्र के बिना अधूरा रह जाए? समाज में पुण्य तभी मान्य होता है जब उसकी गवाही इंस्टाग्राम और फेसबुक दें। आखिर, आजकल ईश्वर से पहले समाज स्वीकार करे, यह ज़रूरी है।
स्नान के बाद मोबाइल उठाया और “हर हर गंगे” के साथ एक सेल्फी डाली। मन को शांति मिली। अब पुण्य पूरे समाज तक पहुंच चुका था। मित्रों ने लाइक और कमेंटों की गंगा बहा दी—”जय गंगे!”, “हमारे नाम की भी डुबकी लगा लो!”, “पुण्य बाँटते रहो!”
एक मित्र ने विशेष आग्रह किया—”भाई, हमारे लिए भी डुबकी लगा दो!” मैं सोच में पड़ गया। अगर हर मित्र की ओर से डुबकी लगाने लगूं, तो कहीं खुद को पुनर्जन्म न लेना पड़ जाए। और अगर मैं सबके नाम की डुबकी गंगा में लगाता, तो मेरे नाम की डुबकी प्रियजनों को नर्मदा में लगानी पड़ती। पुण्य का संतुलन बनाए रखना भी तो आवश्यक है!
बहरहाल, स्नान पूर्ण हुआ, पुण्य सुनिश्चित हुआ, और डिजिटल सबूत के साथ मोक्ष की संभावना भी बढ़ गई। अब बस उम्मीद है कि ईश्वर भी इंस्टाग्राम ब्राउज़ कर रहे होंगे और मेरे पुण्य को लाइक कर देंगे!
हर हर गंगे!
डॉ. महेन्द्र यादव की पाती थोड़ी जज्बाती
प्रयागराज महाकुंभ और डिजिटल स्नान
कुम्भ स्नान का अवसर प्राप्त हुआ। मन में असीम संतोष और आनंद था। गंगा में डुबकी लगाते ही जैसे समस्त पाप धुल गए—या कम से कम ऐसा महसूस हुआ। लेकिन फिर युगधर्म ने सिर उठाया।
पहले तो संकल्प लिया कि फोटो-वीडियो नहीं डालूंगा। भक्ति हृदय की चीज़ है, इसका दिखावा क्यों? परंतु तभी मन में एक संशय जागा—कहीं ऐसा तो नहीं कि कुम्भ स्नान का पुण्य डिजिटल प्रमाणपत्र के बिना अधूरा रह जाए? समाज में पुण्य तभी मान्य होता है जब उसकी गवाही इंस्टाग्राम और फेसबुक दें। आखिर, आजकल ईश्वर से पहले समाज स्वीकार करे, यह ज़रूरी है।
स्नान के बाद मोबाइल उठाया और “हर हर गंगे” के साथ एक सेल्फी डाली। मन को शांति मिली। अब पुण्य पूरे समाज तक पहुंच चुका था। मित्रों ने लाइक और कमेंटों की गंगा बहा दी—”जय गंगे!”, “हमारे नाम की भी डुबकी लगा लो!”, “पुण्य बाँटते रहो!”
एक मित्र ने विशेष आग्रह किया—”भाई, हमारे लिए भी डुबकी लगा दो!” मैं सोच में पड़ गया। अगर हर मित्र की ओर से डुबकी लगाने लगूं, तो कहीं खुद को पुनर्जन्म न लेना पड़ जाए। और अगर मैं सबके नाम की डुबकी गंगा में लगाता, तो मेरे नाम की डुबकी प्रियजनों को नर्मदा में लगानी पड़ती। पुण्य का संतुलन बनाए रखना भी तो आवश्यक है!
बहरहाल, स्नान पूर्ण हुआ, पुण्य सुनिश्चित हुआ, और डिजिटल सबूत के साथ मोक्ष की संभावना भी बढ़ गई। अब बस उम्मीद है कि ईश्वर भी इंस्टाग्राम ब्राउज़ कर रहे होंगे और मेरे पुण्य को लाइक कर देंगे!
हर हर गंगे!
