डॉ. महेन्द्र यादव की पाती थोड़ी जज्बाती

भारतीय सिनेमा ने न जाने कितनी कहानियाँ बुनीं, कितने सपनों को पर्दे पर उतारा, और न जाने कितनी भावनाओं को दर्शकों के दिलों तक पहुँचाया। इन कहानियों को जीवंत करने में जितना योगदान नायकों और नायिकाओं का रहा, उतना ही अहम रोल उन चरित्र अभिनेताओं का भी था, जिन्होंने अपने किरदारों में ऐसी जान डाली कि वे किरदार उनकी पहचान बन गए। ये ऐसे कलाकार थे, जिनके चेहरे देखते ही दर्शक समझ जाते थे कि यह मां है, यह जिम्मेदार भाई है, यह खडूस सास है, या फिर यह शराबी है।
निर्देशकों को इनकी भूमिकाओं को समझाने के लिए कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ता था, क्योंकि इन्होंने पूर्व की फिल्मों में इन किरदारों को इतनी विश्वसनीयता और जीवंतता के साथ निभाया था कि ये रोल उनकी पहचान बन गए। आइए, उन कलाकारों की बात करें जिनकी अदाकारी ने भारतीय सिनेमा के इन अमर किरदारों को हमेशा के लिए जीवित कर दिया।
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मां – निरुपा रॉय:
अगर भारतीय सिनेमा की मां की छवि की बात की जाए, तो सबसे पहले निरुपा रॉय का नाम सामने आता है। ‘दीवार’ की बेबस मां हो या ‘अमर अकबर एंथनी’ की ममतामयी माता, निरुपा रॉय ने हर भूमिका में ऐसी सजीवता भरी कि वे भारतीय सिनेमा की ‘मां’ बन गईं। उनकी आंखों में करुणा और चेहरे पर दर्द की झलक दर्शकों को रुला जाती थी। आज भी जब किसी त्यागमयी मां की कल्पना की जाती है, तो सबसे पहले निरुपा रॉय का चेहरा आँखों के सामने आता है।
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जिम्मेदार भाई – बलराज साहनी:
बलराज साहनी ने भारतीय सिनेमा को जिम्मेदार भाई और संघर्षशील पिता की ऐसी छवि दी, जिसे भुलाया नहीं जा सकता। ‘वक्त’ में परिवार को बिखरने से बचाने की उनकी छटपटाहट हो या ‘दो बीघा ज़मीन’ में मेहनतकश किसान की पीड़ा, उनकी अदाकारी ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया। उनके चेहरे पर हमेशा जिम्मेदारी का बोझ और आंखों में अपनों के लिए प्रेम की गहराई झलकती थी। वे केवल अभिनेता नहीं, बल्कि संवेदनाओं के कलाकार थे।
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पुलिस ऑफिसर – इफ्तिखार खान:
यदि 70 और 80 के दशक की फिल्मों में पुलिस अधिकारी की छवि की बात करें, तो इफ्तिखार खान सबसे पहले याद आते हैं। उनके व्यक्तित्व में ऐसी गंभीरता और अनुशासन था कि उन्हें वर्दी में देखते ही दर्शक समझ जाते थे कि यह ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी हैं। उनकी आवाज़ में सख्ती और चेहरे पर संयम उनके किरदार को और भी विश्वसनीय बनाते थे।
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डाकू – अमजद खान:
‘गब्बर सिंह’ का किरदार अमजद खान की ऐसी पहचान बन गया कि लोग असल ज़िन्दगी में भी उनसे डरने लगे। ‘शोले’ के इस डाकू ने खलनायकी को एक नया आयाम दिया। उनकी संवाद अदायगी, हंसी और भयानक आंखों ने गब्बर को अमर कर दिया। हालांकि उन्होंने अन्य फिल्मों में भी खलनायक की भूमिकाएं निभाईं, लेकिन गब्बर सिंह जैसा किरदार दोबारा भारतीय सिनेमा में कोई नहीं निभा पाया।
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स्मगलर – अजित:
अजित का नाम लेते ही ‘लायन’ की छवि सामने आ जाती है। सफेद सूट, मुंह में सिगार और धीमी, डरावनी आवाज में संवाद अदायगी – अजित ने स्मगलर और अपराधी की भूमिका को बेहद स्टाइलिश अंदाज़ में निभाया। उनके संवाद ‘मोना डार्लिंग’ और ‘लिली, डोंट बी सिली’ आज भी लोगों की जुबान पर हैं। उन्होंने खलनायकी को एक अनोखी पहचान दी, जिसमें डर के साथ-साथ एक आकर्षण भी था।
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कैबरे डांसर – हेलन:
हेलन का नाम लेते ही चमचमाते परिधानों में कैबरे नृत्य करने वाली महिला की छवि उभर आती है। उनके नृत्य में आकर्षण और अदाओं में ऐसी अद्वितीयता थी कि वे हर गीत को यादगार बना देती थीं। ‘महबूबा महबूबा’ हो या ‘पिया तू अब तो आजा’, हेलन के बिना हिंदी फिल्मों के कैबरे की कल्पना अधूरी है।
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शराबी – केस्टो मुखर्जी:
केस्टो मुखर्जी ने अपने हाव-भाव और बोलने के अंदाज़ से शराबी के किरदार को हास्य का ऐसा रंग दिया कि लोग उन्हें देखकर हंस-हंसकर लोटपोट हो जाते थे। उनकी आँखों में मदहोशी और डगमगाते कदमों में ऐसी स्वाभाविकता थी कि वे असल में शराबी लगते थे। उनकी उपस्थिति मात्र से ही सीन में हास्य का तड़का लग जाता था।
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सूदखोर – कन्हैया लाल:
‘मदर इंडिया’ के सूदखोर सुखी लाला के रूप में कन्हैया लाल ने ऐसी घिनौनी और लोभी छवि बनाई कि लोग असल जिंदगी में भी सूदखोरों को उसी नजर से देखने लगे। उनकी चालाक हंसी और कुटिल आंखों में ऐसा पाखंड था कि दर्शक उनसे घृणा करने लगते थे।
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ठाकुर – अमरीश पुरी:
अमरीश पुरी ने ठाकुर और ज़मींदार की भूमिका को इतनी क्रूरता से निभाया कि लोग समझने लगे कि ठाकुर हमेशा ऐसे ही ज़ालिम होते हैं। ‘मिस्टर इंडिया’ के मोगैंबो से लेकर ‘करण अर्जुन’ के ठाकुर दुर्जन सिंह तक, अमरीश पुरी ने हर किरदार में आतंक और खौफ की छवि को जीवित कर दिया।
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जज – मुराद:
जज की भूमिका में मुराद का चेहरा और उनका गम्भीर लहजा आज भी दर्शकों के दिलों में बसा है। सफेद विग, गहरी आवाज और कड़क चेहरा – मुराद ने लगभग हर बड़ी फिल्म में जज की भूमिका निभाई और हमेशा न्यायप्रिय छवि बनाए रखी।
खडूस सास और बुआ – ललिता पवार:
ललिता पवार की तीखी नज़रों और सख्त चेहरे ने खडूस सास और क्रूर बुआ की भूमिका को इतना सजीव बना दिया कि लोग असल ज़िन्दगी में भी उनसे डरने लगे। ‘रामायण’ में मंथरा का उनका किरदार आज भी लोगों के ज़ेहन में बसा हुआ है।
इनके अलावा अन्य प्रतिष्ठित चरित्र:
प्राण – खलनायक और खूंखार डाकू
ए के हंगल – दयालु बुजुर्ग
उत्पल दत्त – गुस्सैल ससुर
मुकरी – हास्य से भरपूर नौकर
जगदीप – मज़ाकिया और शरारती किरदार
मनोज कुमार – देशभक्त नायक
ओम प्रकाश – मजाकिया चाचा
सुजीत कुमार – हीरो का वफादार दोस्त
पहचान बन गए ये किरदार:
इन कलाकारों ने न केवल अपने किरदारों को अमर बना दिया, बल्कि भारतीय सिनेमा में एक ऐसी परंपरा की नींव डाली, जिसमें चरित्र अभिनेता भी उतने ही महत्वपूर्ण हो गए जितने नायक और नायिका। ये सिर्फ कलाकार नहीं थे, बल्कि अपने समय के सांस्कृतिक प्रतीक बन गए।
भारतीय सिनेमा के ये महान चरित्र अभिनेता भले ही अब हमारे बीच न हों, लेकिन उनके निभाए अमर किरदार सदा हमारी यादों में जीवित रहेंगे। वे सिर्फ अभिनेता नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा की आत्मा थे, हैं, और रहेंगे।
